पुणे. भारतीय क्रिकेट टीम का भविष्य मजबूत हाथों में है. इसकी बानगी अंडर-19 वर्ल्ड कप का इतिहास भी देता रहा है और मौजूदा हालात भी ऐसा ही कुछ बयां करते हैं. टीम इंडिया ने वेस्टइंडीज में खेले जा रहे अंडर-19 वर्ल्ड कप का आगाज साउथ अफ्रीका के खिलाफ 45 रन की जोरदार जीत के साथ किया. इस मैच में महाराष्ट्र के विक्की ओस्तवाल ने जबरदस्त प्रदर्शन करते हुए पांच विकेट हासिल किए. लेकिन विक्की सिर्फ वर्ल्ड कप के आगाज मैच में ही नहीं छाए हैं बल्कि इससे ठीक पहले अंडर-19 एशिया कप के फाइनल में तीन विकेट लेकर भारत को चैंपियन भी बनवाया था. लेकिन विक्की के लिए संघर्ष से सफलता तक की ये राह इतनी भी आसान नहीं रही. इस सफर में उनकी कड़ी मेहनत भी शामिल रही तो मुंबई की लोकल ट्रेन में रोजाना तीन घंटों के सफर की हकीकत भी.
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शौकिया क्रिकेट से शुरू हुआ सफर
दरअसल, विक्की ओस्तवाल महाराष्ट्र के हिल स्टेशन लोनावाला में शौकिया तौर पर क्रिकेट खेलते थे. तब कोच मोहन जाधव ने उनकी प्रतिभा देखने के बाद उनके पिता से पुणे स्थानांतरित होने का सुझाव दिया. यही फैसला मास्टरस्ट्रोक साबित हुए और इसके बाद भारतीय अंडर-19 टीम के इस खिलाड़ी ने पीछे मुड़कर नहीं देखा. बाएं हाथ के इस स्पिनर ने वेस्टइंडीज में आईसीसी अंडर -19 विश्व कप के पहले मैच में दक्षिण अफ्रीका के खिलाफ पांच विकेट लेकर भारत की जीत की पटकथा लिखी.
नौ साल की उम्र से खेलना शुरू किया
विक्की ओस्तवाल के कोच मोहन जाधव ने सोमवार को पीटीआई-भाषा से कहा, ‘यह लड़का लोनावाला का रहने वाला है. शुरुआत में, वह नौ साल की उम्र में वेंगसरकर अकादमी में क्रिकेट खेलने के लिए मुंबई गया था. फिर जब वह 10 साल का था तब थेरगांव में वेंगसरकर अकादमी की शाखा में आया.’ उन्होंने कहा, ‘वहीं से उसका सफर शुरू हुआ. पुणे में स्थानांतरित होने का कारण यह था कि लोनावाला मुंबई क्रिकेट संघ (एमसीए) के अधिकार क्षेत्र में नहीं आता है. यह महाराष्ट्र क्रिकेट संघ (एमएसीए) के अंतर्गत आता है.’ इस 19 साल के खिलाड़ी ने भारत की अंडर-19 एशिया कप जीत में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी. उन्होंने फाइनल में श्रीलंका के खिलाफ तीन विकेट लिए थे.
समय बचाने के लिए घर बदला
मोहन जाधव ने साथ ही कहा, ‘विक्की और उनके पिता ने तीन से चार साल तक लोकल ट्रेन से यात्रा की. उनके पिता ने स्कूल से उन्हें जल्दी ले जाने के लिए विशेष अनुमति ली थी और फिर लोनावाला से ट्रेन से चिंचवड़ की यात्रा करते थे. इसमें उन्हें कम से कम डेढ़ घंटा लगता था. कुल मिलाकर वे रोजाना तीन घंटे की यात्रा करते थे.’ जाधव को तब लगा कि अकादमी के पास किसी जगह स्थानांतरित होने से उसकी यात्रा समय बच जाएगा. फिर हमने परिवार से पुणे के आसपास रहने का अनुरोध किया और वे इसके लिए तैयार हो गए. इससे वह अभ्यास में अधिक ध्यान और समय देने लगा.
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