भारत और श्रीलंका के बीच दो टेस्ट मैचों की सीरीज में टीम इंडिया भले ही 1-0 से जीतकर घर वापस लौटी, लेकिन श्रीलंका के सोनल दिनुशा के रूप में इसे हमेशा याद रखा जाएगा. भारत के सामने दो टेस्ट मैचों में करीब 19 घंटे तक बल्लेबाजी करने वाले सोनल दिनुशा ने अपनी जिद से गौतम गंभीर और शुभमन गिल को जीत के लिए तरसा दिया. कोलंबो टेस्ट मैच में एक समय टीम इंडिया जीत के करीब थी, लेकिन तभी श्रीलंका की दीवार बनकर सोनल सामने आए और उन्होंने सब कुछ पलट दिया. अब सोनल के कोच ने उनके सफर को याद करते हुए बताया कि कैसे एक टुक-टुक ड्राइवर का बेटा टेस्ट क्रिकेट के इस मंच तक पहुंचा.
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सोनल के पिता श्रीलंका में चलाते थे टुक-टुक
श्रीलंका के 25 साल के युवा बैटर सोनल का जन्म कोलंबो में ही साल 2000 में हुआ. उनके पिता परिवार का पालन-पोषण टुक-टुक (ऑटो) चलाकर करते थे. लेकिन बेटे को क्रिकेटर बनाने की बाप की चाहत रंग लाई. सोनल के पिता हमेशा अपने बेटे से कहते थे कि तुम्हें किसी और चीज की चिंता करने की जरूरत नहीं है. सिर्फ क्रिकेट पर ध्यान दो. उनके कोच, जो सोनल के स्कूल में उनके सीनियर थे, उन्होंने भी इस खिलाड़ी का बेटे की तरह ध्यान रखा. सोनल को बचपन से ही पता चल चुका था कि क्रिकेट ही उनको और उनके परिवार को आर्थिक संकट और तमाम परेशानियों से बाहर निकालने का एकमात्र रास्ता है. शायद यही उनकी दृढ़ता और मानसिक मजबूती का सबसे बड़ा कारण है.
सोनल के कोच ने क्या कहा?
सोनल ने 12 साल की उम्र से क्रिकेट खेलना शुरू कर दिया था और उनके पिता अपने टुक-टुक में बेटे को लेकर क्रिकेट के मैदान तक जाया करते थे. सोनल के कोच सोनल दुलशन एलवालगे ने इंडियन एक्सप्रेस से बातचीत में बताया कि सोनल के पिता टुक-टुक चलाते थे और उसी से अपने बेटे को लेकर आते थे. वो मेरे ही स्कूल का स्टूडेंट था और बचपन से ही उसके अंदर टिककर खेलने व क्रीज पर बने रहने की आदत थी. वह सुबह नेट्स में जाता था और रात तक बैटिंग करता रहता था. इसके बाद भी उसका मन नहीं भरता था. यही कुछ आदतें हैं, जो उसे टेस्ट क्रिकेट की तरफ खींचती हैं.
सोनल कैसे बने टेस्ट प्लेयर?
सोनल के कोच ने आगे बताया कि उसके पास क्रिकेट जैसे खेल में आगे बढ़ने के लिए पैसे नहीं थे. इसलिए हम सभी लोग मिलकर ध्यान रखते थे कि उसे किसी चीज की कमी न होने पाए. सोनल का ख्याल उसके परिवार के साथ-साथ हम सभी ने रखा. वो क्रिकेट खेलकर जो भी पैसे कमाता था, उसी से अपनी समस्याओं को खुद सुलझाने की कोशिश करता था. हम सभी को पता था कि सोनल एक दिन बड़ा खिलाड़ी बनेगा. उसके क्रीज पर डटकर खेलने की आदत व टेस्ट क्रिकेट के प्रति जुनून से ही सब कुछ संभव हो सका. अब धैर्य उसकी सबसे बड़ी ताकत बन गया और यही चीज कोलंबो टेस्ट में देखने को मिली.
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सोनल ने भारत के खिलाफ 19 घंटे की बैटिंग
कोलंबो टेस्ट मैच की बात करें तो श्रीलंका सिर्फ 16 रन से आगे थी और उसके चार विकेट बाकी थे. इस कठिन पल में सोनल ने क्रीज पर पैर जमाए और पूरे दिन डटकर भारतीय गेंदबाजी का सामना किया. सोनल ने अंगद की तरह क्रीज पर पैर जमाए रखे और दिन के अंत तक 264 गेंदें खेलकर 133 रन बनाए. उन्होंने करीब 500 मिनट तक संघर्ष और धैर्य का बेजोड़ नमूना पेश किया. सोनल के आगे गंभीर और गिल की हर एक प्लानिंग धरी रह गई. नतीजतन, टीम इंडिया ने हथियार डालकर श्रीलंका से ड्रॉ के लिए हाथ मिला लिया. इसके चलते श्रीलंकाई टीम अपने घर में साल 2015 के बाद किसी टेस्ट मैच में टीम इंडिया को जीत से रोक सकी.
सोनल ने अभी तक सिर्फ 5 टेस्ट खेले हैं और तीन शतक उनके नाम हैं. भारत के खिलाफ दो टेस्ट मैचों की सीरीज में सोनल ने करीब 19 घंटे बल्लेबाजी की और कुल 722 गेंदों का सामना किया, जो उनके बाद सबसे ज्यादा गेंद खेलने वाले बल्लेबाज से 224 गेंद ज्यादा हैं. यही कारण है कि सोनल की पारी को श्रीलंका की राष्ट्रीय टीम के हेड कोच गैरी कर्स्टन ने श्रीलंकाई टेस्ट क्रिकेट की महान पारियों में से एक बताया. अब सोनल टेस्ट क्रिकेट में आगे चलकर तमाम उपलब्धियों को अपने नाम करना चाहेंगे.
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