मध्य प्रदेश के 33 साल के ऑफ-स्पिनिंग ऑलराउंडर सारांश जैन को पहली बार भारतीय टीम में चुना गया है. उन्हें 15 अगस्त से श्रीलंका के खिलाफ शुरू होने वाली दो मैचों की टेस्ट सीरीज के लिए 15 खिलाड़ियों की टीम में शामिल किया गया है. घरेलू क्रिकेट में एक दशक से ज़्यादा समय तक रणजी ट्रॉफी सर्किट में कड़ी मेहनत करने वाले इस खिलाड़ी के लिए यह लंबे इंतजार का नतीजा है. उनके यहां तक पहुंचने का सफर काफी संघर्षो से होकर गुजरा है.
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श्रीलंका के खिलाफ सीरीज के लिए भारतीय टेस्ट टीम का ऐलान, जडेजा की वापसी
सारांश जैन के लिए टीम इंडिया के दरवाजे वाशिंगटन सुंदर की जगह पर खुले.रिजर्व स्पिनर-बल्लेबाज के तौर पर पहली पसंद सुंदर भारत के इंग्लैंड दौरे के वनडे मैचों के दौरान दाहिने पैर की हैमस्ट्रिंग में खिंचाव के कारण पहले टेस्ट से बाहर हो गए.श्रीलंका की टीम में कई बाएं हाथ के बल्लेबाज़ थे, ऐसी स्थिति में जब ऑफ-स्पिनर का पैड की तरफ आने वाला एंगल बहुत काम आता है तो सेलेक्टर्स ने इंदौर के इस ऑफ-स्पिनर पर भरोसा जताया. सारांश हाल में इंडिया A के श्रीलंका दौरे से लौटे थे, जहां उन्होंने गॉल में खेले गए दूसरे अनऑफिशियल टेस्ट में नाबाद 70 रन और छह विकेट लेकर अपनी मजबूत दावेदारी पेश की थी.
कौन हैं सारांश जैन?
31 मार्च 1993 में मध्य प्रदेश में जन्में सारांश 2014-15 सीजन से रणजी ट्रॉफ़ी में मध्य प्रदेश का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं और इंटर-ज़ोनल टूर्नामेंट में सेंट्रल जोन और रेस्ट ऑफ इंडिया के लिए भी खेले हैं. सारांश जैन के आंकड़ों की बात करें तो 54 फर्स्ट-क्लास मैचों में उन्होंने 31.75 की औसत से 2223 रन बनाए हैं और 27.30 की औसत से 188 विकेट लिए हैं. उनके चुने जाने में हालिया घरेलू फॉर्म ने अहम भूमिका निभाई. 2025-26 दिलीप ट्रॉफी में सेंट्रल ज़ोन के लिए खेलते हुए उन्होंने सिर्फ दो मैचों में 16 विकेट लिए और सेमीफाइनल व फ़ाइनल दोनों में अहम हाफ़-सेंचुरी लगाई, जिससे उन्हें 'प्लेयर ऑफ द सीरीज़' रहे. इसके बाद ईरानी कप में विदर्भ के ख़िलाफ 'रेस्ट ऑफ़ इंडिया' के लिए उन्होंने चार विकेट लिए और 39 रन बनाए और फिर श्रीलंका में इंडिया A के लिए उनके शानदार प्रदर्शन ने उनके चयन पर पक्की मुहर लगा दी.
पिता ने छिपाई कैंसर की बात
अपने करियर की शुरुआत में 2014 में रणजी ट्रॉफी में शानदार डेब्यू के कुछ ही समय बाद सारांश मध्य प्रदेश की क्लब टीम के साथ पांच मैचों के दौरे पर ऑस्ट्रेलिया गए थे. यह उनका पहला विदेशी दौरा था.उनकी टीम ने सीरीज 3-0 से जीती और सारांश ने भी इसमें अहम भूमिका निभाई, लेकिन घर पर हुई बातचीत के दौरान उन्हें कुछ अजीब लगा. उनके परिवार वाले उन्हें बस यही कहते रहे कि वे थोड़े व्यस्त हैं. उन्होंने इस बात पर ध्यान तो दिया, लेकिन ज़्यादा पूछताछ नहीं की.
इंदौर लौटने पर ही उन्हें असल बात पता चली. उनके पिता सुबोध जैन सर्जरी के बाद बिस्तर पर थे. जब सारांश दौरे पर थे और उन्हें इस बारे में कोई जानकारी नहीं थी, तब उनके पिता को मुंह का कैंसर होने का पता चला था. परिवार ने उन्हें यह न बताने का फैसला किया था, ताकि उनके क्रिकेट में कोई खलल न पड़े. इसके बाद हुई कीमोथेरेपी और सर्जरी की वजह से सुबोध बोल नहीं पा रहे थे. इसलिए उन्होंने पेन और पेपर उठाया और अपने बेटे के लिए एक छोटा सा नोट लिखा. उसमें उन्होंने कहा कि चिंता न करें. बस अपने खेल पर ध्यान दें और वे जल्द ही ठीक हो जाएंगे. सारांश का कहना है कि वह नोट आज भी उनके पास है. तब से हर घरेलू सीजन में वह नोट उनके साथ रहा है.
भाई ने छोड़ा अपना सपना
क्रिकेट सारांश के खून में बसा है. उनके पिता खुद मध्य प्रदेश के लिए रणजी ट्रॉफ़ी क्रिकेट खेलते थे और कभी भारत के लिए खेलने का सपना भी देखते थे. यह सपना उनके साथ खत्म नहीं हुआ, बल्कि अगली पीढ़ी तक पहुंच गया. उनके दोनों बेटे इंदौर के विजय क्लब में ट्रेनिंग करते हुए बड़े हुए. यहीं सारांश ने युवा रजत पाटीदार के साथ ट्रेनिंग की, जो अब मध्य प्रदेश के कप्तान और भारत के जाने-माने बल्लेबाज़ हैं, लेकिन परिवार को क्रिकेट में आगे ले जाने की उम्मीद सारांश से नहीं, बल्कि उनके बड़े भाई से थी. उन्होंने भी उसी क्लब में ट्रेनिंग की और उसी रास्ते पर चले, लेकिन कुछ वजहों से उनके अपने खेलने के सपने पूरे नहीं हो पाए. परिवार का अधूरा क्रिकेट का सपना खत्म होने के बजाय छोटे बेटे सारांश तक पहुंच गया और उनके पिता ही उनके पहले और सबसे अहम कोच बन गए.एक भाई ने अपना सपना छोड़ा, ताकि दूसरे का सफर जारी रह सके और आज उनका यह सफर टीम इंडिया तक पहुंच गया है.
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