उधार की बंदूक, भोपाल का एक तालाब और कजिन भाई का प्रोत्साहन, एशियन गेम्स 2026 में गोल्ड जीतकर इतिहास रचने वाले निशानेबाज नीरू ढांडा का सफर कुछ ऐसे ही शुरू हुआ था.सात साल बाद 26 साल की नीरू ने एशियाड में गोल्ड जीतकर इतिहास रच दिया.नीरू मंगलवार को महिला ट्रैप स्पर्धा में रिकॉर्ड प्रदर्शन के साथ गोल्ड जीतकर एशियन गेम्स में व्यक्तिगत शॉटगन गोल्ड जीतने वाली पहली भारतीय महिला बन गईं.
भाई ने किया मोटिवेट
मध्य प्रदेश राज्य निशानेबाजी अकादमी की ओर से उपलब्ध कराई गई मुफ्त बंदूक और कारतूस ने उन्हें इस खेल को आगे बढ़ाने का अवसर दिया.इस सफर की शुरुआत लक्ष्य से मिली प्रेरणा से हुई जिन्होंने 2018 के जकार्ता एशियाई खेलों में रजत पदक जीता था. अपने भाई की उपलब्धि से प्रेरित होकर नीरू ने निशानेबाजी में हाथ आजमाने का फैसला किया. नीरू ने ऐतिहासिक जीत के बाद कहा कि उससे पहले उन्हें निशानेबाजी के बारे में कुछ भी पता नहीं था. उनके रिश्ते के भाई लक्ष्य ने जकार्ता में रजत पदक जीता था. वह उस पदक से प्रेरित हुई.भाई के पिता की बंदूक लेकर उन्होंने भोपाल के एक तालाब के पास अभ्यास किया. वहां टिन के डिब्बे को अस्थायी निशाना बनाकर उन्होंने खुद ही प्रयास और गलतियों के जरिए निशाना साधना सीखा.
महिला शॉटगन में व्यक्तिगत खिताब का लंबा इंतजार खत्म
उन्होंने कहा कि वह निशाना काफी दूर रखती थी और उस पर निशाना लगाने की कोशिश करती थी.लक्ष्य के माता-पिता ही उन्हें मध्य प्रदेश राज्य निशानेबाजी अकादमी लेकर आए जहां मुफ्त बंदूक, कारतूस और संस्थागत सहयोग ने उनके शुरुआती प्रयास को अंतरराष्ट्रीय करियर में बदलने में अहम भूमिका निभाई. नीरू के लिए यह सहयोग बेहद महत्वपूर्ण था.उनके पिता किसान और मां गृहिणी है. परिवार की आर्थिक स्थिति बहुत अच्छी नहीं होने के कारण निशानेबाजी जैसे महंगे खेल का खर्च उठाना आसान नहीं था.अब यह सहयोग एक ऐतिहासिक उपलब्धि में बदल चुका है.नीरू का एशियाई खेलों का स्वर्ण भारत के लिए महिला शॉटगन में व्यक्तिगत खिताब के लंबे इंतजार को समाप्त करता है.
इवेंट से 10 दिन पहले बीमार
हालांकि नीरू ने यह मेडल बहुत मुश्किल परिस्थितियों के बीच जीता.प्रतियोगिता से केवल 10 दिन पहले गंभीर रूप से बीमार पड़ने के बाद उन्हें अस्पताल में भर्ती होना पड़ा.वह पूरे प्रशिक्षण शिविर में हिस्सा नहीं ले सकीं और पांच दिन तक कुछ नहीं खाया.तैयारी प्रभावित होने के बावजूद उनके कोच मनशेर सिंह ने उनका ध्यान लक्ष्य पर बनाए रखने में मदद की. बीमारी ने जहां उनकी तैयारियों को प्रभावित किया तो वहीं नागोया में लगातार बारिश और गिरते तापमान ने उनकी तकनीक और मानसिक मजबूती की परीक्षा ली.बारिश से उनकी पकड़ प्रभावित हुई और बंदूक संभालने का परिचित अहसास बदल गया जिससे उन्हें अपना ध्यान भटकने से बचाना पड़ा.




