OCI कार्ड रखने वाले 12 क्रिकेटरों ने BCCI के फैसले को क्यों दी चुनौती? अब हाईकोर्ट ने ख‍िलाड़‍ियों से पूछे सवाल

किरण सिंह

किरण सिंह

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बीसीसीआई ने 2024 में टूर्नामेंट में हिस्सा लेने के लिए पात्रता शर्तों में बदलाव किया था.  (Image via Getty)
बीसीसीआई ने 2024 में टूर्नामेंट में हिस्सा लेने के लिए पात्रता शर्तों में बदलाव किया था. (Image via Getty)

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बीसीसीआई ने 2024 में टूर्नामेंट में हिस्सा लेने के लिए पात्रता शर्तों में बदलाव किया था.

बीसीसीआई ने घरेलू टूर्नामेंटों के लिए भारतीय पासपोर्ट होना अनिवार्य कर दिया गया

ओवरसीज सिटीजन ऑफ इंडिया (OCI) कार्ड रखने वाले 12 युवा क्रिकेटरों से बॉम्बे हाई कोर्ट ने सवाल किया है. इन खिलाड़ियों ने भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड (BCCI) के उस फैसले को चुनौती दी है, जिसमें BCCI के टूर्नामेंटों में हिस्सा लेने के लिए भारतीय पासपोर्ट को अनिवार्य कर दिया गया है. कोर्ट ने मौखिक रूप से कहा कि जो खिलाड़ी भारत का प्रतिनिधित्व करने की इच्छा रखते हैं, वे भारतीय नागरिकता के लिए आवेदन करने पर विचार कर सकते हैं. मुख्य न्यायाधीश महेश चंद्र त्रिपाठी और न्यायमूर्ति अद्वैत सेठना की खंडपीठ, कविन कार्तिक, अविक दीक्षित, राम रेपाला, अमेयामनसा रेड्डी पमुलापति, अयान मोहम्मद अहमद, वेदांत पाठक, निर्वेटला ऋषित्व रेड्डी, कोथापल्ली क्रितिन रेड्डी, कोथापल्ली अर्नव रेड्डी, रितेश साई ईश्वर, आर्यन सिंह सिद्धू और कुडुगुंटा कृतिक रेड्डी द्वारा दायर याचिकाओं पर सुनवाई कर रही थी. पीठ ने गौर किया कि केंद्र सरकार, जिसे इस मामले में एक पक्ष बनाया गया है, ने अभी तक अपना जवाब दाखिल नहीं किया है. हालांकि कोर्ट ने संकेत दिया कि सुनवाई को टाला जा सकता है, लेकिन वकील कुणाल चीमा (जिनके साथ वकील दत्ता माने भी थे) ने जजों से याचिकाओं पर विचार करने का आग्रह किया. चीमा ने दलील दी है कि खिलाड़ी केवल घरेलू टूर्नामेंटों में हिस्सा लेने की अनुमति मांग रहे हैं, ना कि इंटरनेशनल स्तर पर भारत का प्रतिनिधित्व करने का कोई तत्काल अधिकार. 

घरेलू स्तर पर योग्यता साबित करने की जरूरत

हालांकि, जजों ने बताया कि भारत में पहले से ही क्रिकेट प्रतिभाओं की एक बड़ी संख्या मौजूद है. मुख्य न्यायाधीश त्रिपाठी ने सवाल किया कि क्या अन्य देश अपने नागरिकों के उपलब्ध होने के बावजूद विदेशी नागरिकों या प्रवासी नागरिकों (ओवरसीज सिटीजन्स) को अपने घरेलू खेल आयोजनों में हिस्सा लेने की अनुमति देंगे. बेंच ने सरकारी नौकरियों और सिविल सेवा परीक्षाओं का उदाहरण देते हुए पूछा कि क्या OCI कार्डधारक इन मौकों के लिए प्रतिस्पर्धा कर सकते हैं. मुख्य न्यायाधीश ने सुझाव दिया कि घरेलू खिलाड़ियों की आपत्तियों की वजह से भी BCCI ने यह फैसला लिया हो सकता है. 

चीमा ने तर्क दिया कि इस पाबंदी ने खिलाड़ियों की क्रिकेट संबंधी महत्वाकांक्षाओं के रास्ते में रुकावट खड़ी कर दी है. उन्होंने कहा कि अगर वे IPL में खेलना भी चाहें, तो अपनी योग्यता साबित करने के लिए उन्हें पहले घरेलू स्तर पर अच्छा प्रदर्शन करना होगा और अपने आंकड़े  बनाने होंगे. BCCI के नियम ने उन्हें अपने टूर्नामेंटों के ज़रिए ऐसा रिकॉर्ड बनाने से रोक दिया. BCCI की ओर से जवाब देते हुए वरिष्ठ वकील डॉ. वीरेंद्र सराफ ने कहा कि नागरिकता कानून के तहत OCI कार्ड धारकों को इंटरनेशनल स्तर पर भारत का प्रतिनिधित्व करने की अनुमति नहीं है. उन्होंने केंद्र सरकार के इस रुख का भी हवाला दिया कि केवल भारतीय नागरिक ही देश के लिए खेल सकते हैं. 

क्रिकेट खेलने के लिए स्वतंत्र


सराफ ने तर्क दिया कि BCCI अपने घरेलू टूर्नामेंटों के ज़रिए खिलाड़ियों की पहचान करने, उन्हें प्रशिक्षित करने और विकसित करने में निवेश करता है. उन्होंने रणजी ट्रॉफी जैसे टूर्नामेंटों का हवाला दिया और कहा कि याचिकाकर्ता स्कूल और कॉलेज की प्रतियोगिताओं, निजी अकादमियों और बोर्ड के अधिकार क्षेत्र से बाहर के अन्य टूर्नामेंटों में खेलना जारी रख सकते हैं. उन्होंने बताया कि BCCI का रुख यह है कि खिलाड़ी शौक के तौर पर क्रिकेट खेलना जारी रख सकते हैं, लेकिन वे बोर्ड की किसी प्रतियोगिताओं के जरिए आजीविका कमाने के अधिकार का दावा नहीं कर सकते. मुख्य न्यायाधीश ने दोहराया कि याचिकाकर्ता अपनी पढ़ाई जारी रखने और क्रिकेट खेलने के लिए स्वतंत्र हैं, लेकिन उन्होंने सवाल किया कि वे भारतीय नागरिकता लिए बिना BCCI द्वारा आयोजित टूर्नामेंटों में हिस्सा लेने पर जोर क्यों दे रहे हैं. पीठ ने कहा कि देश में काफी घरेलू प्रतिभाएं मौजूद हैं और खिलाड़ियों को कोई एक विकल्प चुनना होगा. सराफ ने आगे कहा कि अगर खिलाड़ी भारतीय नागरिक बन जाते हैं, तो BCCI उनका स्वागत करेगा. इस बीच चीमा ने कहा कि वह 25 नवंबर को होने वाली अगली सुनवाई में अदालत के सामने इंटरनेशनल समझौते पेश करेंगे. वे यह तर्क देंगे कि बच्चों को अपनी नागरिकता चुनने का अधिकार है और उन्हें इसे बदलने के लिए मजबूर नहीं किया जाना चाहिए.