पूर्व भारतीय खिलाड़ी लक्ष्मण शिवरामकृष्णन ने खुलासा किया कि कैसे चेहरे के रंग के कारण उनके ताने मिलते थे और जिस कारण वह डिप्रेशन में भी चल गए थे. 1983 से 1987 के बीच भारत के लिए 9 टेस्ट और 16 वनडे खेलने वाले अपने जमाने के बेहतरीन गेंदबाजों में शुमार शिवरामकृष्णन ने खुलासा किया कि रंग के कारण मिलने वाले तानों की वजह से वो इतने तनाव में रहने लगे थे कि वह खुद को आईने में भी नहीं देखना चाहते थे. वह कुछ भी बर्दाश्त नहीं कर पा रहा थे. वह जब भी सोकर जागते तो उन्हें लगता कि वह मरने वाले हैं.
जूते साफ करने को कहा
हालांकि यह उनके लिए पहली बार नहीं था. 14 साल की उम्र में भारत के एक सीनियर बल्लेबाज ने चेपॉक में उन्हें ग्राउंड स्टाफ समझ लिया था और उनसे अपने जूते साफ करने को कहा था. तमिलनाडु के ड्रेसिंग रूम में बड़े खिलाड़ी उन्हें 'करुपा' कहकर बुलाते थे. जब वह उत्तर भारत में बाउंड्री पर फ़ील्डिंग करते थे, तो दर्शक 'कालिया' के नारे लगाते थे;
गेटकीपर ने रोका
शिवरामकृष्णन ने खुलासा किया कि मुंबई के एक होटल में एक गेटकीपर ने उन्हें अंदर दोबारा जाने से रोक दिया था. जबकि वह भारतीय टीम का हिस्सा थे गेटकीपर ने उनका रंग और उनकी उम्र देखी और कहा कि किसी भी हाल में वे भारत के क्रिकेटर नहीं हो सकते. उन्हें अपने किसी साथी खिलाड़ी के आकर उनकी पहचान की पुष्टि करने के लिए एक घंटे तक इंतजार करना पड़ा था.
पूरी तरह से टूट चुके थे
शिवरामकृष्णन ने बताया कि इन सब चीजों की वजह से वह ऐसी हालत में पहुंच गए थे, जहां एक इंसान के तौर पर उनका आत्म-सम्मान बहुत कम हो गया था और जब इतनी कम उम्र में आपका आत्म-सम्मान इतना कम हो जाए तो आत्मविश्वास की बात करना तो दूर आत्मविश्वास बनाना ही बहुत मुश्किल हो जाता है. उन्होंने बताया कि वह हमेशा सब कुछ भूल जाना चाहते थे. लेकिन मन की गहराइयों में वो बातें हमेशा जड़ जमाए रहती हैं और फिर सामने आ ही जाती हैं. उन्होंने कहा कि वह पूरी तरह से टूट चुके थे और वह खुद को आईने में देखना भी नहीं चाहते थे. वह बस दो-चार ड्रिंक्स लेते और सो जाते, क्योंकि वह कुछ भी बर्दाश्त नहीं कर पा रहे थे. जब भी वह जागते, उन्हें यही लगता कि अब वह मरने वाले हैं.

