युवराज सिंह का भारत का कप्तान नहीं बनने का दर्द आया बाहर, बोले- पता नहीं कहां से धोनी...

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युवराज सिंह
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युवराज सिंह का कहना है कि उनके पास उपकप्तानी थी फिर भी वे कप्तान नहीं बन पाए.

युवराज सिंह बोले कि फ्रेंचाइज क्रिकेट के आधार पर देश की कप्तानी तय नहीं होनी चाहिए.

युवराज सिंह भारत के लिए 17 साल तक क्रिकेट खेले लेकिन उन्हें कप्तान बनने का मौका नहीं मिला. वे 2000 में टीम इंडिया का हिस्सा बने थे. उन्होंने नॉकआउट ट्रॉफी के जरिए आईसीसी इवेंट से डेब्यू किया था और आखिरी मैच 2017 में खेला. इस दौरान पहले 11 साल तो वे भारतीय टीम का अहम हिस्सा रहे. मगर पहले सौरव गांगुली कप्तान रहे फिर राहुल द्रविड़ को यह जिम्मा मिला और बाद में महेंद्र सिंह धोनी कप्तान बन गए. युवराज सिंह ने स्पोर्ट्स तक से बात करते हुए हैरानी जताई कि वे उपकप्तान थे फिर भी उन्हें कप्तानी नहीं दी गई.

युवी ने हाल ही में सनराइजर्स हैदराबाद के अभिषेक शर्मा को छोड़कर इशान किशन को कप्तान बनाने के मसले पर बात करते हुए अपने मन की बात कही. उन्होंने कहा, 'जब मैं भारतीय टीम में था तब भज्जी (हरभजन सिंह) सीनियर थे. (वीरेंद्र) सहवाग सीनियर थे. तब मैं उपकप्तान भी रहा था. यह 2007 की बात है. लेकिन पता नहीं कहां से एमएस धोनी आए और वे कप्तान बन गए. जो भी कारण रहा हो. मेरा मतलब है कि फ्रेंचाइज क्रिकेट से तय नहीं होना चाहिए कि देश के लिए कप्तान कौन होगा.'

धोनी कब और कैसे बने भारत के कप्तान

 

धोनी ने 2004 में भारत के लिए डेब्यू किया था. 2007 में टी20 फॉर्मेट के जरिए वे सबसे पहले कप्तान बने. 2007 वनडे वर्ल्ड कप में भारत की नाकामी के बाद उन्हें कमान दी गई. इस इवेंट में भारत के कई बड़े खिलाड़ी जैसे सचिन तेंदुलकर, राहुल द्रविड़, सौरव गांगुली, जहीर खान नहीं खेले थे. धोनी की कप्तानी में भारत ने पहली बार में ही टी20 वर्ल्ड कप जीता था. फिर उन्हें वनडे की कमान भी उन्हें मिल गई. इसके बाद 2008 में उन्हें टेस्ट कप्तानी भी दे दी गई. धोनी 2014 तक भारत के टेस्ट कप्तान रहे. वहीं वनडे और टी20 में 2017 तक उनके पास कमान रही.

युवी बोले- योगदान के बाद भी नजरअंदाज करने निराशा होती है

 

युवी ने आगे कहा, 'सेलेक्टर्स को लगा होगा कि वह भारत की कप्तानी के लिए सही है और शायद ऐसा एमएस धोनी के साथ हुआ होगा तब उनको कप्तान बनाया गया. अगर किसी की किस्मत में कप्तान बनना, भारत के लिए कमाल करना लिखा है तो वह होकर रहेगा. निसंदेह देश के लिए मैच जीतने का लक्ष्य होता है और यही सबसे ज्यादा मतलब रखता है. लेकिन खिलाड़ी के नजरिए से जब कोई सालों से योगदान दे रहा है उसे नजरअंदाज किया जाता है तब निराशा महसूस होती है.'