वीरेंद्र सहवाग के साथ कभी खूब क्रिकेट खेलने वाले मैराज अहमद खान अब एशियन गेम्स 2026 में भारत को निशानेबाजी में गोल्ड दिलाने के लिए तैयार हैं.एक समय था जब वह एक बल्लेबाज के रूप में क्रिकेट में नाम कमाने का सपना देखते थे. तीन दशक से अधिक समय बाद 50 साल के मैराज आज भी खेल जगत में नाम कमाने की राह पर हैं, बस अंतर इतना है कि अब उनके हाथ में बल्ले के बजाय बंदूक है. जापान के आइची-नागोया में होने वाले एशियन गेम्स में वह घुड़सवार श्रुति वोरा के बाद भारतीय दल के दूसरे सबसे उम्रदराज सदस्य होंगे. वह चौथी बार एशियन गेम्स में भाग ले रहे हैं, लेकिन कभी ऐसा समय था जब निशानेबाजी से उनका कोई खास नाता नहीं था.मैराज ने पीटीआई से कहा कि जब 1994 में यह सब शुरू हुआ, तब वह क्रिकेट खेल रहे थे.
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Asian games 2026 से पहले भारत के लिए बुरी खबर
मैराज बाएं हाथ के शीर्ष क्रम के बल्लेबाज थे, जो आमतौर पर तीसरे नंबर पर बल्लेबाजी करने आते थे. उन्होंने 1996 में जामिया मिलिया इस्लामिया में आने से पहले सीके नायडू और वीनू मांकड़ ट्रॉफी में उत्तर प्रदेश का प्रतिनिधित्व किया. उन्होंने अंतर-विश्वविद्यालय क्रिकेट भी खेला और विज़ी ट्रॉफी में भी भाग लिया. उनके साथियों में युवा वीरेंद्र सहवाग भी शामिल थे.उन्होंने बताया कि वह सहवाग के साथ खेले हैं और उनके साथ काफी नेट प्रैक्टिस की है. उन्होंने उनके साथ सिर्फ एक मैच खेला था क्योंकि उसी साल वह भारत की तरफ से खेले.
बंदूक से पुराना नाता
क्रिकेट जहां उनके लिए जुनून था, वही निशानेबाजी भी उन्हें धीरे-धीरे आकर्षित करने लगी.मैराज के लिए बंदूकें कोई अनजानी चीज नहीं थीं. उनका कहना है कि उनका परिवार जमींदार था और वे हमेशा से ही बंदूक रखते आए थे. काफी कम उम्र में उन्होंने एयर राइफल और प्वाइंट 22 राइफल शूटिंग में भी हाथ आजमाया था और यहां तक कि बुलंदशहर में जिला स्तरीय प्रतियोगिता में भी भाग लिया था, जहां उन्होंने 30 रुपये की पुरस्कार राशि जीती थी. उन पैसों से उन्होंने क्रिकेट का बल्ला खरीदा था.
ऐसे बदली राह
दिल्ली आने के बाद ही नियति ने उन्हें खेल के एक अलग रास्ते की ओर मोड़ दिया. वो अक्सर वीकेंड अपने चचेरे भाई के साथ बिताते थे, जो भारतीय वायु सेना में ग्रुप कैप्टन और वायु सेना खेल नियंत्रण बोर्ड में एक वरिष्ठ अधिकारी थे. एक दिन उन्होंने अपने चचेरे भाई को अपनी बंदूक साफ करते हुए देखा. उन्होंने कहा कि मैंने उनसे पूछा कि वे कहां जा रहे हैं. उन्होंने बताया कि दिल्ली के करणी सिंह शूटिंग रेंज में राष्ट्रीय प्रतियोगिता है. वह भी उनके साथ वहां चला गया. उन्होंने वहां जो कुछ देखा उससे वह फैन हो गए.इसके बाद मैराज का निशानेबाजी के प्रति लगाव बढ़ता गया. अगले कुछ साल तक मैराज ने ट्रैप शूटिंग और स्कीट शूटिंग दोनों में हाथ आजमाया.
इसके बाद 1999 में चेन्नई में एक प्रतियोगिता में मैराज का मुकाबला स्कीट शूट-ऑफ में रोंजन सोढ़ी से हुआ, जिन्होंने बाद में डबल ट्रैप में एशियाई खेलों का स्वर्ण पदक जीता. उन्होंने कहा कि वह पहले दो निशाने चूक गए थे.उन्हें लगा कि वह (रोंजन) जीत जाएंगे, लेकिन वह भी अपने दोनों निशाने नहीं लगा सका. अगले दौर में वह जीत गए.मैराज ने कहा कि उसके बाद स्कीट निशानेबाजी उनकी जिंदगी बन गई. उन्होंने फिर कभी ट्रैप गन नहीं उठाई और 1999 में पूरी तरह से स्कीट शूटिंग को अपना लिया. मैराज 2016 के रियो ओलिंपिक में शॉटगन स्कीट स्पर्धा में ओलिंपिक के लिए क्वालीफाई करने वाले पहले भारतीय निशानेबाज बने थे. उन्होंने दो ओलिंपिक खेलों में भाग लिया और वर्ल्ड कप में स्वर्ण और रजत सहित कई पदक जीते.
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