मुकुल चौधरी ने लखनऊ सुपर जायंट्स के लिए कोलकाता नाइट राइडर्स के खिलाफ मैच में जो धमाका किया, उससे उनकी कहानी अचानक सबके सामने आ गई. मुकुल की मेहनत के पीछे उनके पिता दलीप चौधरी की बहुत बड़ी कुर्बानी है. मैच के बाद टाइम्स ऑफ इंडिया से बात करते हुए दलीप ने बताया कि बेटे को क्रिकेटर बनाने का सपना उन्होंने हमेशा से देखा था. इसके लिए उन्होंने अपना सब कुछ दांव पर लगा दिया. घर बेचा, कर्ज लिए और एक वक्त तो जेल भी जाना पड़ा.
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मुकुल ने दिखाया दम
9 अप्रैल को ईडन गार्डन्स में मुकुल ने कमाल कर दिखाया. कोलकाता के खिलाफ आखिरी गेंद तक चले मुकाबले में उन्होंने सात छक्के लगाए और टीम को जीत दिला दी. दलीप बताते हैं, "मैं 2003 में ग्रेजुएट हुआ और उसी साल शादी भी हो गई. तब से मन में एक सपना था कि अगर बेटा हुआ तो उसे क्रिकेटर बनाऊंगा. अगले साल ही मुकुल पैदा हुआ. तब से मैंने ठान लिया कि इस बच्चे को क्रिकेटर बनाकर रहूंगा. जब इतने लोग सफल हो जाते हैं तो मेरा बेटा क्यों नहीं?"
पहले उन्होंने राजस्थान प्रशासनिक सेवा की परीक्षा की तैयारी की, छह साल लगाए लेकिन पास न हो सके. फिर रियल एस्टेट का काम शुरू किया, लेकिन उसमें भी पैसे की तंगी बनी रही. 2016 में उन्होंने मुकुल को सीकर के SBS क्रिकेट हब में दाखिला दिलाया, जो उनके घर से करीब 70 किलोमीटर दूर था. यहीं से मुकुल की असली क्रिकेट ट्रेनिंग शुरू हुई.
शुरुआत से बनी रही पैसे की दिक्कत
दलीप कहते हैं, "बच्चे को एकेडमी में भर्ती कराने के बाद पता चला कि पैसे काफी नहीं हैं. मेरी नियमित आय भी नहीं थी, इसलिए मैंने घर बेच दिया. 21 लाख रुपये मिले. मैंने खरीदार से पूरा पैसा अपने अकाउंट में ट्रांसफर करने को कहा ताकि सब कुछ हिसाब-किताब के साथ हो. अगले साल मैंने होटल शुरू किया और फिर कर्ज लिया." लेकिन पैसे चुकाने में दिक्कत आने लगी. किस्तें समय पर नहीं दे पाए तो मुश्किलें बढ़ गईं. दलीप कहते हैं, "हां, किस्तें समय पर नहीं चढ़ पाईं. मुझे जेल भी जाना पड़ा, लेकिन मैंने कभी धोखाधड़ी नहीं की."
दलीप ने आगे कहा कि, इस पूरे समय रिश्तेदारों और आसपास के लोगों ने भी काफी ताने मारे. दलीप याद करते हुए बताते हैं, "रिश्तेदार मुझसे दूर हो गए. लोग मुझे पागल कहते थे. कई बार मेरे सामने ही कहा गया, 'अपनी जिंदगी तो बर्बाद कर ली, अब बेटे को भी मत बर्बाद कर.' ये सब सुनकर दिल दुखता था, लेकिन इससे हमारी हिम्मत और बढ़ गई. मुझे यकीन हो गया कि जो रास्ता मैंने चुना है, वो सही है." इतनी सारी मुश्किलों के बावजूद दलीप का मुकुल पर भरोसा कभी नहीं डिगा. उन्होंने जो सपना देखा था, उसे पूरा करने के लिए जो भी कुर्बानी देनी पड़ी, वो देते गए.
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