सारांश जैन ने श्रीलंका के खिलाफ कोलंबो टेस्ट में भारत के लिए डेब्यू किया. सारांश ने इस पल का लंबे समय से इंतजार किया था और अब जाकर 33 की उम्र में उन्हें भारत की कैप मिली. रवींद्र जडेजा के हाथों सारांश को डेब्यू कैप पहनते देख उनके पिता सुबोध काफी इमोशनल हो गए, क्योंकि एक समय यह उनका भी सपना था, जो पूरा नहीं हो पाया और फिर अब बेटे के रूप में उनका यह सपना पूरा हुआ. मध्य प्रदेश के पूर्व क्रिकेटर सुबोध का कहना है कि उन्होंने अपने बेटे को भारत के लिए खेलते देखने के लिए कैंसर से लड़ाई लड़ी. अब उनके बेटे ने उन्हें नई जिंदगी दी है और वह लड़ते रहना चाहते हैं और बेटे को और ऊंचाइयों पर पहुंचते देखना चाहते हैं.
परिवार को बोलना पड़ा झूठ
सुबोध ने अपने बेटे के करियर के उस मुश्किल दौर के बारे में बताया, जब वह क्रिकेट छोड़कर उनकी देखभाल करना चाहते थे. उन्होंने बताया कि 2014 में सारांश इंदौर के एक क्लब के साथ ऑस्ट्रेलिया के दौरे पर थे.उसी दौरान उन्हें ओरल कैंसर का पता चला.सर्जरी के बाद उनका मुंह बुरी तरह सूज गया था और वह बोल नहीं पा रहे थे. सारांश की मां और बड़ा भाई उन्हें यही बताते रहे कि वह व्यस्त हैं. सुबोध ने बताया कि जब सारांश ऑस्ट्रेलिया से लौटे और उन्हें देखा, तो वह बुरी तरह टूट गए. सारांश की आंखों में आंसू थे और वह अपने भाई से कह रहे था कि वह क्रिकेट छोड़ना चाहते हैं. इसके बाद उन्होंने कागज पर लिखा कि बेटा, तू जितना अच्छा करेगा, मैं उतनी जल्दी ठीक हो जाऊंगा.
मध्य प्रदेश के पूर्व ऑफ़-स्पिनर रहे सुबोध अपने बेटे के कोच तब से हैं जब सारांश ने क्रिकेट में अपने शुरुआती कदम रखे थे, लेकिन वे कोच चंद्रकांत पंडित को इसका श्रेय देते हैं कि उन्होंने ही उनके बेटे में यह भरोसा जगाया कि वह टॉप लेवल पर खेल सकते हैं.




