क्या है BCCI के COE का 'परफॉर्मेंस ब्लॉक', जिसे हार्दिक पंड्या ने इंग्लैंड के ख‍िलाफ जल्दबाजी में वापसी करने की बजाय चुना?

SportsTak

SportsTak

अपडेटेड:

हार्द‍िक पंड्या ने नया प्रोग्राम चुना.  (Getty)
हार्द‍िक पंड्या ने नया प्रोग्राम चुना. (Getty)

Story Highlights:

सेंटर ऑफ एक्सीलेंस ने परफॉर्मेंस ब्लॉक प्रोग्राम की शुरुआत की.

हार्द‍िक पंड्या ने नया प्रोग्राम चुना.

BCCI के 'सेंटर ऑफ एक्सीलेंस' (CoE) ने 'परफॉर्मेंस ब्लॉक' की एक नई शुरुआत की है, जिसका मकसद यह पक्का करना है कि सेंट्रल कॉन्ट्रैक्ट वाले खिलाड़ी पूरे साल अपनी बेहतरीन फॉर्म में बने रहें, न कि इस सुविधा का इस्तेमाल सिर्फ चोट से उबरने (रिहैबिलिटेशन) के लिए ही किया जाए. इस प्रोग्राम को इस तरह से बनाया गया है कि जरूरत पड़ने पर टीम इंडिया के खिलाड़ियों को खास कोचिंग और स्किल-डेवलपमेंट के मौके मिल सकें. साथ ही यह चोटिल क्रिकेटरों के लिए 'रिटर्न-टू-प्ले' (खेल में वापसी) की प्रक्रिया का एक अहम हिस्सा भी बनेगा. टाइम्स ऑफ इंडिया के अनुसार ऑलराउंडर हार्दिक पंड्या इस प्रोग्राम को चुनने वाले पहले हाई-प्रोफाइल खिलाड़ियों में से एक बन गए हैं.  


‘परफॉर्मेंस ब्लॉक’ क्या है?

र‍िपोर्ट के अनुसार BCCI के सोर्स का कहना है कि CoE मुख्य रूप से इंटरनेशनल क्रिकेटर्स के लिए एक रिहैब सेंटर था. क्रिकेट प्रोग्राम सिर्फ एज-ग्रुप और जोनल कैंप तक ही सीमित थे. अब भारत के खिलाड़ी कभी भी आ सकते हैं और अपने खेल की बारीकियों पर काम करने के लिए खास सेशन में हिस्सा ले सकते हैं. खिलाड़ियों के साथ काम करने के लिए एक डेडिकेटेड कोचिंग स्टाफ होगा. साथ ही इस प्रोग्राम के तहत किसी चोटिल खिलाड़ी को भारत के लिए खेलने के लिए तभी फिट माना जाएगा जब वह अपनी पूरी क्षमता के साथ खेल रहा हो. 

सोर्स ने आगे बताया कि पंड्या जब तक फिटनेस और क्रिकेट दोनों मामलों में अपने खेल के टॉप लेवल पर नहीं होंगे, तब तक वह खुद भारत के लिए मैदान पर नहीं उतरेंगे. वह खुद पर ज़्यादा ज़ोर डालकर अपने शरीर को जोखिम में नहीं डालना चाहते, क्योंकि ODI वर्ल्ड कप में अभी 16 महीने बाकी हैं. उन्होंने CoE से संपर्क किया और परफ़ॉर्मेंस ब्लॉक से जुड़े. वह बेहतरीन फिटनेस हासिल करने के साथ-साथ क्रिकेट की खास स्किल्स पर भी काम करना चाहते हैं. 

इस प्रोग्राम के तहत रिहैबिलिटेशन अब सिर्फ शारीरिक रिकवरी तक ही सीमित नहीं है. उदाहरण के लिए जैसे-जैसे तेज गेंदबाज़ों का वर्कलोड बढ़ता है, उनके परफॉर्मेंस की क्वालिटी को परखा जाता है. फिटनेस वापस पाने के बाद भी अगर खिलाड़ी मैच जैसी स्थितियों में अच्छा परफ़ॉर्म नहीं कर पाते हैं, तो उनकी वापसी में देरी हो सकती है.