एम्बाप्पे की आंधी को रोका, फ्रांस का घमंड तोड़ा! कौन है स्पेन का नया 'चाणक्य', जिसने 4 साल में बदल दिया स्पेनिश फुटबॉल का DNA

Shubham Pandey

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spain manager Luis de la Fuente
spain manager Luis de la Fuente

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लुइस दे ला फुएंते ने चार साल में स्पेन फुटबॉल का DNA बदल दिया

स्पेन ने उनकी कोचिंग में UEFA नेशंस लीग और यूरो 2024 का खिताब जीता

कमजोर लोगों को हराने के लिए ताकत की जरूरत होती है, लेकिन चालाक और शक्तिशाली लोगों को जीतने के लिए केवल बुद्धि और सही समय का इंतजार चाहिए. प्राचीन भारत के महान राजनीतिज्ञ आचार्य चाणक्य की ये पंक्तियां स्पेन की उस फुटबॉल टीम पर फिर सटीक बैठती हैं, जिसे पिछले माह तक फीफा वर्ल्ड कप 2026 का दावेदार तक नहीं माना जा रहा था. लेकिन अब उनकी ये टीम फाइनल तक आ पहुंची है. चार साल पहले 2022 में दम तोड़ते स्पेनिश फुटबॉल को यहां तक लाने में उनके 'चाणक्य' यानी मास्टरमाइंड कहे जाने वाले लुइस दे ला फुएंते का काफी अधिक योगदान है. जिनके बुने जाल में शक्तिशाली स्टार्स (एमबाप्पे, ओरेलिएन चुआमेनी, ओसमान डेम्बेले और माइकल ओलीसे) से सजी फ्रांस की टीम फंसी और तरसती नजर आई. लुइस दे ला फुएंते के चक्रव्यूह का फ्रांस के पास कोई तोड़ नजर नहीं आया और दुनिया की नंबर वन टीम ने घुटने टेक दिए. अब चलिए जानते हैं कि कौन हैं लुइस दे ला फुएंते और कैसे उन्होंने 4 साल में स्पेनिश फुटबॉल के डीएनए को बदल दिया.

युवाओं के साथ एक दशक तक काम किया

लुइस दे ला फुएंते की सबसे खास बात यह रही कि वह सीनियर टीम का मैनेजर बनने से पहले एक दशक तक स्पेन के युवाओं के साथ काम करते रहे. उन्होंने स्पेन की अंडर-19 टीम को 2015 में और अंडर-21 टीम को 2019 में यूरोपीय चैंपियन बनाया. इतना ही नहीं, 2020 के टोक्यो ओलंपिक में उनके रहते टीम ने सिल्वर मेडल भी जीता. जिसके चलते लुइस दे ला फुएंते ही लामिन यमाल और निको विलियम्स जैसे युवा विंगर्स को प्रमुख टीम में लेकर आए और उन्हें खुलकर खेलने का मौका दिया. इससे वह अपने खिलाड़ियों को बखूबी समझते भी हैं.

6 महीने में स्पेन को जिताया खिताब

साल 2022 में सीनियर मैनेजर बनने के बाद ही स्पेन के चाणक्य लुइस दे ला फुएंते का जादू देखने को मिलने लगा था. साल 2023 में लुइस दे ला फुएंते के रहते स्पेन की टीम ने उनके आने के 6 महीने के भीतर ही UEFA नेशंस लीग 2023 जीता, फिर यूरो 2024 का खिताब जीता और अब वर्ल्ड कप जीतने की दहलीज पर आ गए हैं.

लुइस ने स्टार्स के पीछे भागने के बजाय टीम वर्क पर फोकस किया और मिडफील्ड का लीडर रोड्रि को बनाया. जिनके इर्द-गिर्द टीम का डिफेंस और अटैक बैलेंस में रहता है. ये चाल सेमीफाइनल में भी काम आई.

रोद्री, फैबियन रुइज़ और ओयारज़ाबल ने मिलकर स्पेन के मिडफील्ड को मजबूत किया. ऐसा करने से फ्रांस की डिफेंसिव लाइन (बैक-फोर) थोड़ी आगे आ गई. जिससे बने खाली स्पेस में फिर लामिन यमाल और निको विलियम्स ने अटैक करना शुरू किया. इसका ही नतीजा रहा कि यमाल को पेनल्टी मिली और स्पेन के खाते में गोल आया.

एमबाप्पे के लिए बनाया घेरा, डिफेंडर्स को गोल करने की आजादी

स्पेन ने एमबाप्पे के लिए एक घेरा तैयार किया और उन्हें पास देने वाले फ्रांस के मिडफील्ड को रोक दिया गया. एमबाप्पे को गेंद ही नहीं मिली, तो पूरे 90 मिनट के मैच में वह एक भी शॉट ऑन टारगेट नहीं लगा सके. जैसे ही गेंद उनके पास जाती, राइट-बैक पेड्रो पोरो, सेंटर-बैक और मिडफील्ड से रोड्रि मिलकर उन्हें तुरंत घेर लेते. जिससे एमबाप्पे को गेंद लेकर भागने के लिए स्पेस ही नहीं मिल रहा था और वह पूरे मैच में बेअसर रहे.

वहीं स्पेन के रोड्रि और फैबियन रुइज़ ने मिडफील्ड पर कंट्रोल रखा, तो फ्रांस के मिडफील्डर ओरेलिएन चुआमेनी अलग-थलग पड़ गए. इसके अलावा डिफेंडर्स को सिर्फ गेंद रोकने ही नहीं, बल्कि आगे बढ़कर मौका मिलने पर गोल करने की आजादी भी थी.

यही कारण था कि फ्रांस के डिफेंडर्स जब डैनी ओल्मो को रोक रहे थे, तो अचानक स्पेन के डिफेंडर पेड्रो पोरो ने आगे आकर गोल करके स्पेन की जीत निश्चित कर दी थी. जिसके चलते फ्रांस लुइस दे ला फुएंते के चक्रव्यूह से निकलने का रास्ता नहीं खोज सका.

लुइस दे ला फुएंते का करियर और उनका स्टाइल

लुइस दे ला फुएंते की बात करें तो उनका जन्म 21 जून 1961 को स्पेन के हारो में हुआ था. लुइस अपने करियर के दौरान लेफ्ट बैक पोजीशन पर खेले और उन्होंने अपने करियर का गोल्डन टाइम एथलेटिक बिल्बाओ के साथ बिताया, जब उन्होंने 1982-83 और 1983-84 में दो बार ला लीगा का खिताब जीता. साल 1994 में अलावेस क्लब की तरफ से खेलते हुए उन्होंने रिटायरमेंट लिया और उसके बाद एक बेहतरीन मैनेजर के तौर पर सामने आए. लुइस दे ला फुएंते खुद को फिट रखने के लिए घंटों जिम करते हैं और खुद को एक सिस्टम मैन भी मानते हैं. वह खिलाड़ियों के साथ एक पिता या फिर एक टीचर की तरह काम करते हैं. उनका मानना है कि एक मैनेजर को कमांडर नहीं, बल्कि एक पिता की तरह खिलाड़ियों के साथ रहना चाहिए. 

उनकी इसी फिलॉसफी से स्पेन की टीम चार साल में थकाऊ टिकी-टाका से उभरकर एक खतरनाक टीम बनी और वह ठीक इस तरह खेल रही है, जैसे बुद्धिमान व्यक्ति अपनी सफलता का ढिंढोरा नहीं पीटते, बल्कि अपनी योग्यता और चुपचाप बनाई गई रणनीतियों से दुनिया को झुका देते हैं. अब स्पेन की टीम भी शांत स्वभाव से वर्ल्ड कप जीतकर दुनिया को अपने कदमों पर लाना चाहेगी.

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