मेसी की आंधी को रोका, अर्जेंटीना का घमंड तोड़ा! कौन है स्पेन का नया 'चाणक्य', जिसने 4 साल में स्पेन को बनाया वर्ल्ड चैंपियन

Shubham Pandey

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spain manager Luis de la Fuente
spain manager Luis de la Fuente

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लुइस दे ला फुएंते ने चार साल में स्पेन फुटबॉल का DNA बदल दिया

स्पेन ने उनकी कोचिंग में UEFA नेशंस लीग और यूरो 2024 का खिताब जीता

कमजोर लोगों को हराने के लिए ताकत की जरूरत होती है, लेकिन चालाक और शक्तिशाली लोगों को जीतने के लिए केवल बुद्धि और सही समय का इंतजार चाहिए. प्राचीन भारत के महान राजनीतिज्ञ आचार्य चाणक्य की ये पंक्तियां स्पेन की उस फुटबॉल टीम पर फिर सटीक बैठती हैं, जिसे पिछले माह तक फीफा वर्ल्ड कप 2026 का दावेदार तक नहीं माना जा रहा था. लेकिन अब उनकी ये टीम वर्ल्ड चैंपियन बन चुकी है. चार साल पहले 2022 में दम तोड़ते स्पेनिश फुटबॉल को यहां तक लाने में उनके 'चाणक्य' यानी मास्टरमाइंड कहे जाने वाले लुइस दे ला फुएंते का काफी अधिक योगदान है. जिनके बुने जाल में शक्तिशाली स्टार्स (एमबाप्पे, मेसी) से सजी फ्रांस व अर्जेंटीना की टीम फंसी और दोनों ही गेंद पाने को तरसती नजर आई. लुइस दे ला फुएंते के चक्रव्यूह का सेमीफाइनल में फ्रांस के पास कोई तोड़ नहीं था तो फाइनल में अर्जेंटीना के मैनेजर लियोनेल स्कलोनी सिर पकड़े नजर आए. अब चलिए जानते हैं कि कौन हैं लुइस दे ला फुएंते और कैसे उन्होंने 4 साल में स्पेनिश फुटबॉल के डीएनए को बदल दिया.

युवाओं के साथ एक दशक तक काम किया

लुइस दे ला फुएंते की सबसे खास बात यह रही कि वह सीनियर टीम का मैनेजर बनने से पहले एक दशक तक स्पेन के युवाओं के साथ काम करते रहे. उन्होंने स्पेन की अंडर-19 टीम को 2015 में और अंडर-21 टीम को 2019 में यूरोपीय चैंपियन बनाया. इतना ही नहीं, 2020 के टोक्यो ओलंपिक में उनके रहते टीम ने सिल्वर मेडल भी जीता. जिसके चलते लुइस दे ला फुएंते ही लामिन यमाल और निको विलियम्स जैसे युवा विंगर्स को प्रमुख टीम में लेकर आए और उन्हें खुलकर खेलने का मौका दिया. इससे वह अपने खिलाड़ियों को बखूबी समझते भी हैं.

6 महीने में स्पेन को जिताया खिताब

साल 2022 में सीनियर मैनेजर बनने के बाद ही स्पेन के चाणक्य लुइस दे ला फुएंते का जादू देखने को मिलने लगा था. साल 2023 में लुइस दे ला फुएंते के रहते स्पेन की टीम ने उनके आने के 6 महीने के भीतर ही UEFA नेशंस लीग 2023 जीता, फिर यूरो 2024 का खिताब जीता और अब 4 साल में वर्ल्ड कप भी जीत लिया है.

लुइस ने स्टार्स के पीछे भागने के बजाय टीम वर्क पर फोकस किया और मिडफील्ड का लीडर रॉड्री को बनाया, जिनके इर्द-गिर्द टीम का डिफेंस और अटैक बैलेंस में रहता है. ये चाल वर्ल्ड चैंपियन बनने के काम आई. इसके अलावा उन्होंने स्पेन के डिफेंस को ऐसा अभेद किला बनाया कि पूरे टूर्नामेंट में उनकी टीम ने सिर्फ एक गोल बेल्जियम से खाया और बाकी सभी मैचों में क्लीन शीट के साथ जीत दर्ज की. इससे साफ नजर आता है कि स्पेन की टीम संगठित होकर मैदान में खेलती है और संगठन में ही सकती के विचार को अपनाती है. उनका कोई भी खिलाड़ी टीम की जरूरत पड़ने पर किसी भी रोल के लिए तैयार रहता है, डिफ़ेंडर को भी गोल करने की आजादी ही इस स्पेन टीम को चैंपियन बनाती है, सेमीफाइनल मैच में डिफ़ेंडर पेड्रो पोरो ने गोल करके फ्रांस को घुटने टेकने पर मजबूर कर दिया था. 

एमबाप्पे व मेसी के लिए बनाया घेरा

स्पेन ने सेमीफाइनल में एमबाप्पे के लिए एक घेरा तैयार किया और उन्हें पास देने वाले फ्रांस के मिडफील्ड को रोक दिया गया. एमबाप्पे को गेंद ही नहीं मिली, तो पूरे 90 मिनट के मैच में वह एक भी शॉट ऑन टारगेट नहीं लगा सके. जैसे ही गेंद उनके पास जाती, राइट-बैक पेड्रो पोरो, सेंटर-बैक और मिडफील्ड से रोड्रि मिलकर उन्हें तुरंत घेर लेते. जिससे एमबाप्पे को गेंद लेकर भागने के लिए स्पेस ही नहीं मिल रहा था और वह पूरे मैच में बेअसर रहे.

एमबाप्पे के जैसा ही हाल मेसी का भी फाइनल मे स्पेन के सामने रहा. वह पूरे 120 मिनट तक मैदान में रहे लेकिन मेसी के शॉट की बात करें तो उनको सिर्फ एक शॉट मिला. यानि स्पेन ने फ्रांस का जो हाल किया था ठीक उसी तरह अर्जेंटीना को भी शर्मसार कर दिया. स्पेन ने ज़ोनल और पोजीशनल ट्रैप का इस्तेमाल करके मेसी को बेअसर कर दिया और उनको गेंद देने वाले जूलियन अल्वारेज़ व एलेक्सिस मैक एलिस्टर सभी को ब्लॉक करके रखा. 

लुइस दे ला फुएंते का करियर और उनका स्टाइल

लुइस दे ला फुएंते की बात करें तो उनका जन्म 21 जून 1961 को स्पेन के हारो में हुआ था. लुइस अपने करियर के दौरान लेफ्ट बैक पोजीशन पर खेले और उन्होंने अपने करियर का गोल्डन टाइम एथलेटिक बिल्बाओ के साथ बिताया, जब उन्होंने 1982-83 और 1983-84 में दो बार ला लीगा का खिताब जीता. साल 1994 में अलावेस क्लब की तरफ से खेलते हुए उन्होंने रिटायरमेंट लिया और उसके बाद एक बेहतरीन मैनेजर के तौर पर सामने आए. लुइस दे ला फुएंते खुद को फिट रखने के लिए घंटों जिम करते हैं और खुद को एक सिस्टम मैन भी मानते हैं. वह खिलाड़ियों के साथ एक पिता या फिर एक टीचर की तरह काम करते हैं. उनका मानना है कि एक मैनेजर को कमांडर नहीं, बल्कि एक पिता की तरह खिलाड़ियों के साथ रहना चाहिए. 

उनकी इसी फिलॉसफी से स्पेन की टीम चार साल में थकाऊ टिकी-टाका से उभरकर एक खतरनाक टीम बनी और वह ठीक इस तरह खेल रही है, जैसे बुद्धिमान व्यक्ति अपनी सफलता का ढिंढोरा नहीं पीटते, बल्कि अपनी योग्यता और चुपचाप बनाई गई रणनीतियों से दुनिया को झुका देते हैं. अब स्पेन की टीम ने भी शांत स्वभाव से वर्ल्ड कप जीतकर दुनिया को अपने कदमों पर झुका दिया है.

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