गरीबी से ग्लासगो तक...रोटी के लिए दौड़ने वाला गुलवीर कैसे बना भारत की शान? 10KM में रच दिया इतिहास

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सिल्वर मेडल के साथ गुलवीर सिंह
सिल्वर मेडल के साथ गुलवीर सिंह

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गुलवीर सिंह ने 10,000 मीटर में सिल्वर मेडल जीता

किसान परिवार से आने वाले गुलवीर ने गरीबी से संघर्ष किया

ग्लासगो में जारी कॉमनवेल्थ गेम्स में भारतीय सेना के जवान गुलवीर सिंह ने कमाल कर दिया. गरीबी को चुनौती देने के लिए गुलवीर ने सिर्फ दौड़ को ही चुना. किसान परिवार से होने के नाते गुलवीर अपने आर्थिक संकट से उबरना चाहते थे और उन्होंने फौज में नौकरी पाने का रास्ता सिर्फ दौड़ को ही चुना. इसके चलते उन्होंने दौड़ के दम पर सेना में नौकरी तो पा ली, लेकिन उसका असली मतलब आर्मी में आने के बाद समझा. गुलवीर ने नायब सूबेदार बनने के बाद आर्मी स्पोर्ट्स में अपना जलवा दिखाया और देखते ही देखते उसी दौड़ का मतलब बदल गया. अब देश की शान बढ़ाते हुए उन्होंने भारत को 10 हजार मीटर यानी 10 किलोमीटर (मेंस) की दौड़ में कॉमनवेल्थ गेम्स के इतिहास का पहला मेडल दिलाया. यही कारण है कि गुलवीर अब हीरो बन चुके हैं. आइए जानते हैं कि कैसे उन्होंने गरीबी से ग्लासगो तक का सफर तय किया.

गुलवीर ने सिर्फ आर्मी भर्ती के लिए चुनी थी 'दौड़'

भारत की शान और सेना के जवान गुलवीर की बात करें तो उनका जन्म अलीगढ़ जिले के सिरसा गांव में हुआ था. गुलवीर के पिता किसान थे और उनके पास खेती करने के लिए बहुत अधिक जमीन नहीं थी. इसके चलते परिवार को आर्थिक संकट से भी जूझना पड़ा. इस बीच गुलवीर ने दौड़ को ही गले लगाया और सबसे पहले इसे आर्मी में नौकरी पाकर घर को सहारा देने का साधन माना. गुलवीर ने दौड़ के जरिए पहले सेना में नौकरी पाई और उसके बाद आर्मी स्पोर्ट्स के जरिए इसे अपने करियर के रूप में अपनाया.

साल 2018 में आर्मी में नौकरी पाने के बाद गुलवीर ने आर्मी स्पोर्ट्स इंस्टीट्यूट और बाद में भारतीय खेल प्राधिकरण (SAI) के राष्ट्रीय कैंप में हिस्सा लिया. गुलवीर की पोस्टिंग अरुणाचल प्रदेश जैसे कठिन इलाकों में हुई. वहां भी ड्यूटी करने के बाद उन्होंने दौड़ना जारी रखा और कभी भी पीछे मुड़कर नहीं देखा.

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