इंग्लैंड के बल्लेबाज ओली पोप ने अफगानिस्तान प्रीमियर लीग (APL) के ड्राफ़्ट से अपना नाम वापस ले लिया है. पोप APL के पहले सीजन के लिए चुने जाने वाले इंग्लैंड के एकमात्र ऐसे खिलाड़ी थे, जिनके पास सेंट्रल कॉन्ट्रैक्ट था. यह टूर्नामेंट इस साल के आखिर में संयुक्त अरब अमीरात (UAE) में होने वाला है. उनका यह फ़ैसला ऐसे समय में आया है जब इस बात पर बहस चल रही है कि क्या अफग़ानिस्तान में महिलाओं के साथ तालिबान के बर्ताव को देखते हुए इंग्लिश क्रिकेटरों को इस प्रतियोगिता में हिस्सा लेना चाहिए. सोमवार को जब इंग्लैंड के नए कॉन्ट्रैक्ट्स की पुष्टि हुई, तो क्रिकेट डायरेक्टर रॉब की ने कहा कि वह APL में नहीं खेलेंगे, लेकिन इंग्लैंड के खिलाड़ियों को इसमें हिस्सा लेने से रोकना कानूनी तौर पर मुश्किल है.
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किसी भी इंग्लिश खिलाड़ी को लीग में हिस्सा लेने के लिए इंग्लैंड एंड वेल्स क्रिकेट बोर्ड (ECB) से 'नो ऑब्जेक्शन सर्टिफ़िकेट' (NOC) की ज़रूरत होगी. चूंकि पोप एक कॉन्ट्रैक्टेड खिलाड़ी हैं, इसलिए APL के लिए सरे (Surrey) के इस खिलाड़ी की उपलब्धता तय करने में रॉब की की भूमिका होती. हालांकि ऐसा माना जा रहा है कि पोप ने इस महीने के आखिर में होने वाले ड्राफ़्ट से हटने का फैसला रॉब की राय से अलग होकर खुद लिया है. रॉब की ने 'टेस्ट मैच स्पेशल' पॉडकास्ट में कहा कि कानूनी तौर पर खिलाड़ियों को इन टूर्नामेंट्स में खेलने के लिए जाने से रोकना मुश्किल है. यह एक नैतिक फ़ैसला बन जाता है और खिलाड़ियों को सही नैतिक रुख अपनाने के लिए तैयार रहना चाहिए. व्यक्तिगत तौर पर और मेरे लिए यह कहना आसान है कि मैं खेलने नहीं जाता, लेकिन यह फ़ैसला खिलाड़ी को ही करना है.
क्रिकेट और मानवाधिकारों पर बहस
2021 में तालिबान के सत्ता में लौटने के बाद से ECB ने अफ़गानिस्तान के साथ द्विपक्षीय सीरीज़ आयोजित करने से इनकार कर दिया है. हालांकि, इंग्लैंड वर्ल्ड कप और चैंपियंस ट्रॉफ़ी जैसे बड़े इंटरनेशनल टूर्नामेंट में अफगानिस्तान के खिलाफ खेलता रहा है_ की (Key) ने अफगानिस्तान में महिलाओं के साथ किए जा रहे व्यवहार का भी विरोध किया. की ने कहा कि मैं अफगानिस्तान में महिलाओं के साथ किए गए व्यवहार से सहमत नहीं हूं. वहां जिस तरह से चीजें होती हैं, मैं उनसे सहमत नहीं हूं, इसलिए मैं ऐसा कुछ नहीं करूंगा. हालांकि इंग्लैंड के पूर्व बल्लेबाज डेविड मलान उन खिलाड़ियों में शामिल हैं जिन्होंने APL ड्राफ़्ट में हिस्सा लिया है. उनके साथ मोईन अली, जेम्स विंस और जेम्स रेव भी हैं. मलान ने कहा कि खिलाड़ियों को अपनी निजी मान्यताओं और रोज़ी-रोटी कमाने के बीच मुश्किल फ़ैसला करना पड़ता है. मलान ने कहा कि एक खिलाड़ी के तौर पर यह मुश्किल होता है क्योंकि आपको यह देखना होता है कि नैतिक रूप से क्या सही है और कानून के हिसाब से क्या सही है. उन्होंने आगे कहा कि खिलाड़ियों को अक्सर अपने क्रिकेट बोर्ड से एक स्पष्ट रुख की ज़रूरत होती है. उन्होंने यह सवाल भी उठाया कि जब इंग्लैंड ग्लोबल टूर्नामेंट में अफ़गानिस्तान के खिलाफ़ खेलता रहता है तो खिलाड़ियों से व्यक्तिगत फ़ैसले लेने की उम्मीद क्यों की जाती है.
12 महीने का कॉन्ट्रैक्ट
पिछले साल दिसंबर में ऑस्ट्रेलिया में तीसरे एशेज टेस्ट के बाद से कोई इंटरनेशनल क्रिकेट न खेलने के बावजूद पोप को इंग्लैंड का नया 12 महीने का कॉन्ट्रैक्ट दिया गया है. उन्हें घरेलू समर सीज़न में पाकिस्तान के खिलाफ सीरीज़ के लिए टेस्ट टीम में वापस बुलाया गया था और उन्होंने छह मौकों पर कप्तान की भूमिका निभाई है, जिसमें 2025 में द ओवल में भारत के खिलाफ मैच भी शामिल है. जब उनसे पूछा गया कि क्या उन्होंने पोप को अपनी बात साफ-साफ बता दी है, तो की ने जवाब दिया कि मैंने वह बातचीत की थी और अब ओली को अपना फ़ैसला लेना होगा.
मैच बहिष्कार करने की मांग
2025 चैंपियंस ट्रॉफ़ी में इंग्लैंड और अफ़गानिस्तान के बीच पिछले मैच से पहले लेबर पार्टी की सांसद टोनिया एंटोनियाज़ी ने इस मैच का बहिष्कार करने की मांग की थी. BBC के अनुसार सितंबर में उन्होंने कहा था कि हम फिर से उसी स्थिति में क्यों हैं? अफ़गानिस्तान में महिलाओं और लड़कियों को हमारे देश की महिलाओं और लड़कियों जैसे अधिकार नहीं मिलते हैं और महिला टीम देश से बाहर रह रही है. क्या खिलाड़ियों को इसकी चिंता नहीं है, खासकर उन खिलाड़ियों को जिनकी बेटियां, बहनें या मां हैं. उनका कहना था कि उन्हें उम्मीद है कि इंटरनेशनल क्रिकेट काउंसिल (ICC) इस इवेंट को मंजूरी देने से इनकार कर देगी. अफगानिस्तान को फ़ुल मेंबर का दर्जा देते रहना, अपनी ही मेंबरशिप की शर्तों का मजाक उड़ाने जैसा है.
क्रिकेटरों को ही क्यों बनाया जाता है निशाना
शुक्रवार को इंग्लैंड के पूर्व ऑल-राउंडर मोईन के एजेंट डीन अहमद ने X पर लिखा कि खेल में नैतिकता मायने रखती है, लेकिन निरंतरता भी मायने रखती है. महिलाओं के साथ तालिबान का व्यवहार ऐसा है जिसका बचाव नहीं किया जा सकता. फिर भी क्रिकेटरों को ही क्यों निशाना बनाया जाता है, जबकि सरकारें और कंपनियां उन देशों के साथ संबंध बनाए रखती हैं, जिन पर मानवाधिकारों के गंभीर उल्लंघन का आरोप है.
तालिबान का महिलाओं के साथ खराब बर्ताव के विरोध में टीम और खिलाड़ियों का कदम
- तालिबान की जेंडर पॉलिसी (लिंग-आधारित नीतियों) के खिलाफ अपने नैतिक रुख के कारण इंग्लिश बल्लेबाज ओली पोप ने अफगानिस्तान प्रीमियर लीग T20 ड्राफ़्ट से नाम वापस ले लिया, जबकि इसके लिए उन्हें इंग्लैंड एंड वेल्स क्रिकेट बोर्ड (ECB) से 'नो ऑब्जेक्शन सर्टिफ़िकेट' (NOC) की ज़रूरत थी.
- इंग्लैंड ने अफगानिस्तान के खिलाफ़ द्विपक्षीय क्रिकेट सीरीज खेलने से मना कर दिया था. इंग्लैंड क्रिकेट बोर्ड का कहना था कि तालिबान का महिलाओं के साथ बर्ताव जेंडर रंगभेद (gender apartheid) जैसा है. हालांकि वे वर्ल्ड कप और चैंपियंस ट्रॉफ़ी जैसे ग्लोबल मल्टी-टीम टूर्नामेंट में अफ़गानिस्तान के खिलाफ़ खेलते रहते हैं.
- क्रिकेट ऑस्ट्रेलिया भी महिलाओं के खेलों पर प्रतिबंध के विरोध में अफगानिस्तान के खिलाफ़ द्विपक्षीय क्रिकेट सीरीज रद्द कर चुका है.
- अफगानिस्तान की महिला फुटबॉल टीम 2021 में तालिबान के कब्जे के बाद अफ़गानिस्तान से भाग गईं और देश से बाहर फिर से एकजुट हुईं और FIFA से 'रिफ्यूजी-स्टेटस नेशनल टीम' के तौर पर अहम मान्यता हासिल की, ताकि वे इंटरनेशनल लेवल पर खेल सकें, जबकि तालिबान के कंट्रोल वाली फ़ुटबॉल फ़ेडरेशन ने महिलाओं के खेलों पर प्रतिबंध लगा रखा है.
25 महिला खिलाड़ियों के साथ कॉन्ट्रैक्ट
2017 से एक फ़ुल मेंबर अफ़गानिस्तान के पास कोई महिला टीम नहीं है, लेकिन 2021 में तालिबान के कब्ज़े से पहले वे एक टीम बना रहे थे. 2020 में ACB ने 25 महिला खिलाड़ियों के साथ कॉन्ट्रैक्ट किया था, लेकिन उन्होंने कभी कोई इंटरनेशनल मैच नहीं खेला. तालिबान के शासन में महिलाओं के खेल में हिस्सा लेने पर रोक लगा दी गई है और शिक्षा व हेल्थकेयर जैसी सार्वजनिक जीवन की सभी चीज़ों में उन पर पाबंदियां बढ़ गई हैं. महिलाओं के अधिकारों पर की गई सख्ती की एमनेस्टी इंटरनेशनल और संयुक्त राष्ट्र समेत कई इंटरनेशनल संगठनों ने आलोचना की है. अफ़गानिस्तान अभी भी FIFA और ICC जैसे वैश्विक संगठनों का सदस्य बना हुआ है. साथ ही उसने पिछले साल पेरिस ओलिंपिक में तीन पुरुषों और तीन महिलाओं की एक टीम भेजी थी. ये खिलाड़ी देश से बाहर रह रहे थे और तालिबान सरकार ने उन्हें मान्यता नहीं दी थी.
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