एक किक जिस पर हंसी दुनिया, लेकिन पीछे था मौत का डर, 52 साल बाद वर्ल्ड कप खेलने वाली DR कांगो के संघर्ष का काला सच

DR Congo Story : फीफा वर्ल्ड कप 2026 में डीआर कांगो ने पहली बार राउंड ऑफ 32 में जगह बनाकर इतिहास रच दिया. लेकिन क्या आप जानते हैं कि 1974 वर्ल्ड कप में इसी देश, तब के जायरे, का पूरी दुनिया ने मजाक उड़ाया था?

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Shubham Pandey

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DR Congo team players

डीआर कांगो टीम के खिलाड़ी

Story Highlights:

डीआर कांगो ने पहली बार फीफा वर्ल्ड कप के राउंड ऑफ 32 में जगह बनाई

1974 में जायरे के नाम से खेलने वाली टीम का दुनिया भर में मजाक उड़ाया गया

मजाक उड़ाने वालों को जवाब है खामोशी मेरी, वक्त आने दो, मेरे चर्चे हर जुबां पर छाएंगे! ये प्रेरणादायक पंक्तियां फुटबॉल वर्ल्ड कप 2026 के राउंड ऑफ 32 में पहली बार जगह बनाने वाली डीआर कांगो टीम पर बिल्कुल फिट बैठती हैं. डीआर कांगो, जिसे भारत में कई फुटबॉल फैंस आम बोलचाल की भाषा में 'डॉक्टर कांगो' कहकर उसका मजाक भी बनाते हैं. लेकिन असलियत में मजाक तो इस देश का 1974 में उड़ा था, जब उनके एक खिलाड़ी ने ब्राजील को फ्री-किक मिलने के बाद खुद ही किक से गेंद हवा में उड़ा दी थी. इस घटना के बाद डीआर कांगो (तब 'जायरे' नाम से खेलने वाली टीम) का खूब मजाक उड़ाया गया और उन्हें फुटबॉल का 'जोकर' तक कहा गया. किसी ने कहा कि इस टीम को फुटबॉल के नियम तक नहीं पता, फिर यह वर्ल्ड कप कैसे खेल रही है. लेकिन जब इस घटना के पीछे की असली वजह सामने आई, तो पूरी दुनिया ने जायरे के उस खिलाड़ी की खामोशी का सम्मान किया. अब उसी देश की टीम 52 साल बाद फीफा वर्ल्ड कप के नॉकआउट में पहुंची है और अपने शानदार प्रदर्शन के चलते हर जुबां पर छाई हुई है.

डीआर कांगो, जिसने जायरे नाम से इतिहास बनाया

दरअसल, डीआर कांगो, जिसे तब जायरे के नाम से जाना जाता था, अफ्रीका का एक देश है. वहां 1965 से 1997 के बीच लोकतंत्र नहीं, बल्कि क्रूर और दमनकारी तानाशाह मोबुतु सेसे सेको का शासन था. इसी शासक ने कांगो का नाम बदलकर जायरे रखा था. जब 1974 में उनकी टीम ने फीफा वर्ल्ड कप के लिए क्वालिफाई किया, तो वह उप-सहारा अफ्रीका की पहली टीम बनी, जिसने वर्ल्ड कप में जगह बनाई. इस ऐतिहासिक उपलब्धि से तानाशाह मोबुतु बेहद खुश था. उसने खिलाड़ियों के लिए पीले रंग की जर्सी खुद डिजाइन करवाई और सभी खिलाड़ियों को अपने आवास पर बुलाया. इस दौरान उसने वादा किया कि हर खिलाड़ी को नई कार, घर और 20,000 डॉलर (आज के हिसाब से लगभग 16 लाख रुपये) नकद दिए जाएंगे. इन वादों से उत्साहित खिलाड़ी 1974 का वर्ल्ड कप खेलने वेस्ट जर्मनी पहुंचे, लेकिन वहां पहुंचते ही पूरी कहानी बदल गई.

जायरे के खिलाड़ियों के साथ हुआ धोखा

जायरे के कोच यूगोस्लाविया के ब्लागोजे विदिनिक थे. टीम का वेस्ट जर्मनी में शानदार स्वागत हुआ, लेकिन इसके बाद सरकार और राष्ट्रीय फुटबॉल संघ के कई अधिकारियों ने खिलाड़ियों को मिलने वाला पैसा हड़प लिया. खिलाड़ियों को बुनियादी सुविधाओं तक के लिए संघर्ष करना पड़ा. जब खिलाड़ियों ने इस बारे में कोच से सवाल किया, तो उन्होंने बताया कि उन्हें आदेश मिला है कि सभी खिलाड़ी होटल में ही रहेंगे और बाहर नहीं जाएंगे. धीरे-धीरे टीम के ड्रेसिंग रूम में निराशा और तनाव बढ़ने लगा. नतीजा यह रहा कि पहले मुकाबले में उन्हें स्कॉटलैंड के खिलाफ 2-0 से हार मिली. हालांकि उस समय स्कॉटलैंड जैसी मजबूत टीम को सिर्फ 2-0 से रोकना भी जायरे के अच्छे प्रदर्शन की निशानी माना गया.

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कोच को खिलाड़ियों से अलग किया, आठ खिलाड़ी नहीं खेलना चाहते थे मैच

अब दूसरा मुकाबला यूगोस्लाविया के खिलाफ था. लेकिन मैच से पहले टीम अधिकारियों ने कोच को खिलाड़ियों से अलग-थलग कर दिया. प्रेस कॉन्फ्रेंस में दावा किया गया कि यूगोस्लाविया से होने के कारण कोच ने विरोधी टीम को जायरे की रणनीति बता दी है. इस कारण टीम बिना कोच के मैदान में उतरी. हालात इतने खराब थे कि आठ खिलाड़ी मैच खेलने तक के इच्छुक नहीं थे. फिर भी वे बेमन से मैदान पर उतरे और जायरे को 9-0 की शर्मनाक हार का सामना करना पड़ा. इसी हार के साथ उनका वर्ल्ड कप अभियान लगभग समाप्त हो गया और आखिरी मुकाबला ब्राजील से होना था.

'3-0 से ज्यादा हारे तो परिवार को जान से मार देंगे'

ब्राजील के खिलाफ अंतिम मैच से पहले सरकार के अधिकारी ड्रेसिंग रूम में पहुंचे. उन्होंने कहा कि देश के शासक मोबुतु सेसे सेको का आदेश है कि अगर ब्राजील के खिलाफ तीन से अधिक गोल खाए, तो खिलाड़ी दोबारा अपने परिवार या जायरे नहीं लौट पाएंगे. यानी उन्हें और उनके परिवार को जान से मारने की धमकी दी गई.

मैच के दौरान जायरे 2-0 से पीछे था. तभी ब्राजील को फ्री-किक मिली. इस पर कहीं तीसरा गोल ना हो जाए इस डर से जायरे के खिलाड़ी म्वेपु इलुंगा दौड़ते हुए आए और खुद ही गेंद को दूर मार दिया. उस समय कमेंटेटरों और दुनिया भर के लोगों ने बिना सच्चाई जाने उनका मजाक उड़ाया और उन्हें फुटबॉल का जोकर तक कहा. जबकि मैच रेफरी ने इलुंगा को सिर्फ येलो कार्ड किया था. 

फ्री-किक मारने को लेकर इलुंगा ने क्या कहा?

कई वर्षों तक मजाक झेलने के बाद इलुंगा म्वेपु ने बीबीसी से बातचीत में बताया कि उन्होंने ऐसा जानबूझकर किया था. उन्होंने कहा कि अगर ब्राजील तीसरा गोल कर देता, तो उनके परिवार की जान खतरे में पड़ सकती थी. इसलिए उन्होंने समय बर्बाद करने के लिए गेंद को दूर मार दिया. उन्हें फुटबॉल के नियम अच्छी तरह पता थे.

हालांकि इसके बावजूद जायरे को ब्राजील के खिलाफ 3-0 से हार मिली. जब खिलाड़ी अपने देश लौटे, तो उनका न तो स्वागत हुआ और न ही उनसे किए गए वादे पूरे किए गए. कार, घर और इनाम में से उन्हें कुछ भी नहीं मिला. नतीजा यह रहा कि 1974 वर्ल्ड कप खेलने वाले कई खिलाड़ी गरीबी में जिंदगी बिताने को मजबूर हुए. कुछ यूरोप जाकर बस गए. इलुंगा भी बाद में ब्रिटेन में रहने लगे. कुछ खिलाड़ियों ने मर्सिडीज फैक्ट्री में नौकरी की और फुटबॉल खेलकर अपना जीवनयापन किया.

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'अगर दूसरा जीवन मिला, तो किसान बनूंगा, फुटबॉलर नहीं'

आज 1974 की जायरे टीम, जो अब डीआर कांगो के नाम से जानी जाती है, उसके अधिकांश खिलाड़ी भुला दिए गए हैं. उन्हें अपने ही देश में कभी वह सम्मान नहीं मिला, जिसके वे हकदार थे. इलुंगा ने अपनी किताब 'डेथ ऑर ग्लोरी: द डार्क हिस्ट्री ऑफ द वर्ल्ड कप' में लिखा कि अगर उन्हें दूसरा जीवन मिला, तो वे फुटबॉलर बनने की बजाय किसान बनना पसंद करेंगे.

लेकिन इलुंगा और उनके साथियों की कहानी को डीआर कांगो की मौजूदा टीम ने कब्र से निकालकर जिंदा कर दिया है. 52 साल बाद वही देश पहली बार फीफा वर्ल्ड कप के नॉकआउट में पहुंचा और अब इंग्लैंड के खिलाफ राउंड ऑफ 32 में गर्व से खेलता नजर आएगा. यह सिर्फ एक मैच नहीं, बल्कि उन खिलाड़ियों के सम्मान की लड़ाई भी होगी, जिन्हें 1974 में वह पहचान और सम्मान कभी नहीं मिला, जिसके वे असली हकदार थे. जिस डीआर कांगो का फीफा के मंच मजाक उड़ाया गया, आज उसी टीम के खेल की चर्चा पूरी दुनिया में हो रही है.

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