FIFA WC 2026: फीफा वर्ल्ड कप 2026 का रोमांच अपने चरम पर है. इस टूर्नामेंट में जहां छोटी-छोटी टीमें इतिहास रच रही हैं, वहीं मेसी ने भी पहले मैच में अपने 20 साल के वर्ल्ड कप करियर की पहली हैट्रिक जमाई. जर्मनी और यूएसए जैसी टीमें राउंड ऑफ 32 में जगह बना चुकी हैं, जबकि तुर्की और ट्यूनीशिया जैसी टीमें बाहर हो चुकी हैं. लेकिन इस वर्ल्ड कप में सबका ध्यान नई टेक्नोलॉजी से बनी बॉल ने भी अपनी ओर खींचा है. इस गेंद में एक चिप का इस्तेमाल किया गया है और क्रिकेट की तरह यह चिप फुटबॉल में भी अहम भूमिका निभा रही है. आइए जानते हैं कि फीफा वर्ल्ड कप 2026 में इस्तेमाल हो रही ट्रायोंडा गेंद की क्या खासियत है और इसमें लगी चिप कैसे मदद कर रही है.
कितने घंटे तक गेंद होती है चार्ज?
फीफा वर्ल्ड कप में इस्तेमाल होने वाली बॉल को हर मैच से पहले ढाई घंटे तक चार्ज किया जाता है. जब यह गेंद मैच में इस्तेमाल नहीं हो रही होती, तब इसे वायरलेस डॉक पर चार्ज किया जाता है. इसके लिए एक विशेष व्यक्ति भी नियुक्त किया गया है, जो गेंद की चार्जिंग का ध्यान रखता है. इस तकनीक से लैस गेंद को "कनेक्टेड बॉल" नाम दिया गया है. हालांकि, अभ्यास सत्र के दौरान खिलाड़ियों को चिप वाली गेंद नहीं दी जाती. इसलिए उन्हें केवल मैच के दौरान ही इस कनेक्टेड बॉल से खेलने का मौका मिलता है.
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कैसे लगाई गई चिप?
कनेक्टेड बॉल को लेकर जानकारी मिली है कि फुटबॉल में चिप लगाना सबसे बड़ी चुनौती थी, क्योंकि गेंद की एरोडायनामिक्स और बैलेंस से कोई समझौता नहीं किया जा सकता था. इस बॉल के चार पैनल हैं और उनकी साइड्स में चिप लगाई गई है, ताकि गेंद का संतुलन न बिगड़े. इसके लिए करीब 300 लैब टेस्ट किए गए और चिप वाली गेंद को बिना चिप वाली गेंद के व्यवहार के समान बनाया गया. नतीजतन, दोनों गेंदों में कोई अंतर महसूस नहीं किया जा सकता.


