अस्मिता डे...आज ये नाम देश के हर शख्स की जुबां है. 23 साल की इस खिलाड़ी ने कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 में वो कर दिखाया, जो आज से पहले कभी कोई भारतीय खिलाड़ी नहीं कर पाया.अस्मिता ने महिलाओं की 48 किग्रा वेट कैटेगरी में देश के लिए गोल्ड जीता.जूडो में भारत का यह कॉमनवेल्थ गेम्स के इतिहास का पहला गोल्ड मेडल है.अस्मिता कॉमनवेल्थ गेम्स में गोल्ड जीतने वाली पहली भारतीय जूडोका बनी. कभी फाइनल की बाधा में अटकने वाली अस्मिता ने फाइनल ने कनाडा की हाइडी क्वाच को हराया. विजेता का फैसला गोल्डन स्कोर में हुआ. इस ऐतिहासिक जीत के बाद अस्मिता ने स्पोर्ट्स तक से बातचीत में चैंपियन बनने के अपने सफर को लेकर खुलकर बात की.
कॉमनवेल्थ गेम्स का टिकट कटाने से पहले पिता की मौत
22 मार्च 2003 में साउथ त्रिपुरा में जन्मीं अस्मिता के पिता अर्जुन डे साइकिल ठीक करने का काम करते थे.उन्होंने हमेशा अस्मिता को सपोर्ट किया, मगर दिसंबर 2025 में उस वक्त उनकी जिंदगी में भूचाल आ गया, जब उसके सबसे बड़े सपोर्ट सिस्टम ने उनका साथ छोड़ा. उनके सिर से पिता का साया हमेशा के लिए उठ गया. दिसंबर 2025 में दिल्ली में होने वाले सिलेक्शन ट्रायल में अस्मिता के कॉमनवेल्थ गेम्स के लिए क्वालिफाई करने से कुछ दिन पहले ही उनके पिता का ब्रेन स्ट्रोक से निधन हो गया. जिसने अस्मिता को तोड़ दिया, मगर वो फिर उठी और ग्लास्गो के लिए खुद को तैयार किया.
पिता थे सबसे बड़े सपोर्ट सिस्टम
कॉमनवेल्थ में जीत के बाद अस्मिता ने खास बातचीत में बताया कि पिता मेरे लिए एक मजबूत सहारा थे. जब भी मुझे अपने खेल के लिए पैसों की जरूरत होती, वे हमेशा कहते कि तू कर, मैं कहीं न कहीं से इंतजाम कर लूंगा. पिता ने साइकिल की दुकान से भी काफी सपोर्ट किया.कुछ भी नहीं होता था, तब भी पिता मैनेज करते थे. उन्होंने बताया कि जब उनका पहली बर सीनियर नेशनल में गोल्ड आया तो फाइनल लेट चल रहा था.उनके पापा टेंशन में थे, क्योंकि मैंने फोन नहीं किया. उन्हें लगा कि हार की वजह से मैं कॉल नहीं रही हूं. वह खाना भी सही से नहीं खाए फिर मैंने फोन किया और गोल्ड जीतने की खबर थी. उस मेडल से वो इतने खुश थे तो इस मेडल से तो बहुत खुश होते.




