फीफा वर्ल्ड कप 2026 अब क्वार्टरफाइनल की दहलीज पर आ गया है. 48 टीमों के साथ शुरू होने वाला यह टूर्नामेंट अब सिमटकर आठ टीमों के बीच रह गया है. इनके बीच अब क्वार्टरफाइनल, सेमीफाइनल और फिर फाइनल मुकाबले खेले जाएंगे. लेकिन फीफा वर्ल्ड कप के दौरान सिर्फ खिलाड़ी ही नहीं, बल्कि उनसे जुड़ी कई चीजें भी फैंस को चौंका रही हैं. इसी कड़ी में पुर्तगाल के खिलाड़ी पेड्रो नेटो प्री-क्वार्टर फाइनल में जब अपने जूते को पीछे से काटकर मैदान में उतरे, तो सभी की नजर उस पर पड़ी. आइए जानते हैं कि उन्होंने ऐसा क्यों किया और वह कौन-सी 100 साल पुरानी बीमारी है, जो आज भी खिलाड़ियों के बीच देखने को मिल रही है.
ADVERTISEMENT
पुर्तगाल के खिलाड़ी ने पहने कटे जूते
फुटबॉल पूरी तरह से पैरों की मांसपेशियों पर निर्भर रहने वाला खेल है. इसमें ऐकिलीज़ टेंडन, घुटना और टखना काफी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं. यही कारण है कि फुटबॉलर्स अक्सर एसीएल टियर, हैमस्ट्रिंग स्ट्रेन, एंकल स्प्रेन और हिप की समस्याओं से जूझते हुए दिखाई देते हैं. मगर इन सबके बीच जब पुर्तगाल के खिलाड़ी पेड्रो नेटो कटी हुई एड़ी वाले जूते पहनकर मैदान में आए, तो एक पुरानी बीमारी का नाम सामने आया. इसे हैग्लंड की विकृति (Haglund's Deformity) कहा जाता है. यह 100 साल से अधिक पुरानी समस्या है और इसी के चलते कई खिलाड़ी कटी हुई एड़ी वाले जूते पहनकर मैदान में उतरते हैं.
क्या है हैग्लंड की विकृति?
हैग्लंड की विकृति में खिलाड़ी या किसी व्यक्ति की एड़ी के पिछले हिस्से में नीचे की ओर एक हड्डीनुमा उभार आ जाता है. यह उभार उसी जगह बनता है, जहां ऐकिलीज़ टेंडन एड़ी की हड्डी से जुड़ा होता है. खेलते समय यह उभार आसपास के सॉफ्ट टिशू पर दबाव डालने लगता है, जिससे ऐकिलीज़ टेंडन और एड़ी के पास मौजूद बर्सा (तरल पदार्थ से भरी छोटी थैली) में सूजन और दर्द होने लगता है. यही स्थिति हैग्लंड की विकृति कहलाती है.
गेंद पकड़ने और फोटो खींचने के बाद भी फैंस अपने पास क्यों नहीं रख सकते बॉल?
क्यों काटते हैं जूते?
एड़ी के पीछे बने इस उभार की वजह से खिलाड़ियों को काफी परेशानी का सामना करना पड़ता है. इस हिस्से पर पड़ने वाले दबाव को कम करने के लिए फुटबॉल बूट के पिछले हिस्से को काट दिया जाता है. इससे एड़ी पर पड़ने वाला दबाव काफी कम हो जाता है और खिलाड़ी को खेलते समय राहत मिलती है. यही कारण है कि इस विकृति से पीड़ित खिलाड़ी अपने जूते किसी विशेषज्ञ से कटवाकर पहनते हैं, ताकि उन्हें खेलने में कम परेशानी हो.
बीमारी का नाम कैसे पड़ा हैग्लंड?
इस बीमारी का सबसे पहले वर्ष 1927 में स्वीडन के सर्जन पैट्रिक हैग्लंड ने वर्णन किया था. इसी वजह से उनके नाम पर इस विकृति का नाम हैग्लंड की विकृति रखा गया. 100 साल से अधिक समय बीत जाने के बाद भी यह समस्या कई खिलाड़ियों में देखने को मिलती है. हालांकि, हर मरीज में इसके लक्षण समान नहीं होते. कुछ खिलाड़ियों को इससे कोई खास परेशानी नहीं होती, जबकि कुछ मामलों में सर्जरी तक की जरूरत पड़ सकती है. हालांकि, ज्यादातर मामलों में फुटबॉल बूट में बदलाव, फिजियोथेरेपी और शॉकवेव थेरेपी जैसे उपचारों से इस समस्या को नियंत्रित किया जा सकता है.
टीम इंडिया में चुने जाने पर प्रभसिमरन का छलका दर्द, बोले -'डेब्यू करके लौटना है'
ADVERTISEMENT











