न्यौता मिलने पर आए, दो घंटे इंतजार किया, फिर राज ठाकरे से मिले बिना ही CWG के गोल्ड मेडलिस्ट को लौटना पड़ा घर

द‍िलीप गावित पुरुषों की 100 मीटर T47 इवेंट में भारत के पहले कॉमनवेल्थ गेम्स गोल्ड मेडलिस्ट हैं. उन्हें राज ठाकरे के नासिक दौरे के दौरान ठाकरे से मिलने के लिए बुलाया गया था.

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दिलीप गावित ने कॉमनवेल्थ गेम्स में गोल्ड मेडल जीता था.(PC: Getty)

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दिलीप गावित ने कॉमनवेल्थ गेम्स में गोल्ड मेडल जीता था.

गाव‍ित को राज ठाकरे के नासिक दौरे पर मिलने के लिए बुलाया गया था.

कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 में भारतीय पैरा-एथलेटिक्स के लिए इतिहास रचने के कुछ ही दिनों बाद गोल्ड मेडलिस्ट दिलीप गावित एक बिल्कुल अलग वजह से सुर्खियों में आ गए.पुरुषों की 100 मीटर T47 इवेंट में भारत के पहले कॉमनवेल्थ गेम्स गोल्ड मेडलिस्ट बने 23 साल के इस स्प्रिंटर ने गुरुवार को नासिक में महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (MNS) प्रमुख राज ठाकरे से मिलने के लिए लगभग दो घंटे तक इंतजार किया, लेकिन बिना मुलाकात किए ही उन्हें लौटना पड़ा.

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बुलाया गया, लेकिन इंतजार करना पड़ा

PTI के अनुसार पैरा-एथलीट गावित के कोच वैजनाथ काले ने बताया कि MNS प्रमुख के नासिक दौरे के दौरान गावित को ठाकरे से मिलने के लिए बुलाया गया था.हालांकि तय जगह पर पहुंचने के बावजूद गावित और उनके कोच को लगभग दो घंटे तक इंतजार करना पड़ा.वहां का एक वीडियो सामने आया है जिसमें MNS कार्यकर्ता दोनों से और इंतजार करने का अनुरोध करते हुए उन्हें यह समझाने की कोशिश कर रहे हैं कि राज ठाकरे व्यस्त हैं. वीडियो में काले को यह कहते हुए सुना जा सकता है कि हम काफी देर से इंतजार कर रहे थे.सर व्यस्त हैं.हम उनसे बाद में मिलेंगे.जिसके बाद वे वहां से चले गए.  


ग्लासगो में इतिहास रचने वाले चैंपियन

गावित ने कॉमनवेल्थ गेम्स में भारत को एक यादगार जीत द‍िलाई थी.नासिक के इस स्प्रिंटर ने 10.71 सेकंड का गेम्स-रिकॉर्ड बनाते हुए पुरुषों की 100 मीटर T47 स्पर्धा में गोल्ड मेडल जीता.उनके साथ मोहम्मद बासिल मोर्सिंगनाकथ ने सिल्वर मेडल जीता, जिससे भारत ने इस स्पर्धा में ऐतिहासिक रूप से पहला और दूसरा स्थान हासिल किया.यह जीत पैरा एथलेटिक्स की 100 मीटर T47 स्पर्धा में भारत का पहला कॉमनवेल्थ गेम्स गोल्ड मेडल था. 


हिम्मत और लगन से भरी एक यात्रा

गावित की कामयाबी इसलिए भी खास है, क्योंकि उन्होंने इसे काफी संघर्ष के बाद हासिल किया है.महाराष्ट्र के एक आर्थिक रूप से कमजोर आदिवासी परिवार में जन्मे गावित ने बचपन में एक हादसे में अपना दाहिना हाथ खो दिया था. उनकी ज़िंदगी तब बदली जब 12 साल की उम्र में कोच वैजनाथ काले ने उन्हें अपनी देखरेख में लिया और उनकी पढ़ाई व खेल-कूद में मदद की.

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