FIFA WC 2026 : ढाई घंटे में चार्ज होती है वर्ल्ड कप की बॉल, क्या है ये 'कनेक्टेड टेक्नॉलजी' और इसका क्रिकेट से कैसा कनेक्शन? जानें सब कुछ

FIFA World Cup 2026 में खिलाड़ियों के शानदार प्रदर्शन के साथ-साथ ट्रायोंडा कनेक्टेड बॉल भी चर्चा का विषय बनी हुई है. एडिडास की इस हाई-टेक गेंद में लगी चिप VAR सिस्टम को रियल-टाइम डेटा उपलब्ध कराती है .

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Shubham Pandey

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Trionda Adidas ball

फुटबॉल वर्ल्ड कप में इस्तेमाल होने वाली बॉल

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FIFA World Cup 2026 में ट्रायोंडा कनेक्टेड बॉल

ट्रायोंडा बॉल को ढाई घंटे तक चार्ज किया जाता है

FIFA WC 2026: फीफा वर्ल्ड कप 2026 का रोमांच अपने चरम पर है. इस टूर्नामेंट में जहां छोटी-छोटी टीमें इतिहास रच रही हैं, वहीं मेसी ने भी पहले मैच में अपने 20 साल के वर्ल्ड कप करियर की पहली हैट्रिक जमाई. जर्मनी और यूएसए जैसी टीमें राउंड ऑफ 32 में जगह बना चुकी हैं, जबकि तुर्की और ट्यूनीशिया जैसी टीमें बाहर हो चुकी हैं. लेकिन इस वर्ल्ड कप में सबका ध्यान नई टेक्नोलॉजी से बनी बॉल ने भी अपनी ओर खींचा है. इस गेंद में एक चिप का इस्तेमाल किया गया है और क्रिकेट की तरह यह चिप फुटबॉल में भी अहम भूमिका निभा रही है. आइए जानते हैं कि फीफा वर्ल्ड कप 2026 में इस्तेमाल हो रही ट्रायोंडा गेंद की क्या खासियत है और इसमें लगी चिप कैसे मदद कर रही है.

फीफा वर्ल्ड कप की गेंद में क्या है खास?

फीफा वर्ल्ड कप 2026 अमेरिका, मैक्सिको और कनाडा में खेला जा रहा है. इसमें नीला रंग अमेरिका, लाल रंग कनाडा और हरा रंग मैक्सिको का प्रतिनिधित्व करता है. यही कारण है कि इसका नाम ट्रायोंडा रखा गया है. एडिडास की यह ट्रायोंडा गेंद कई मायनों में खास है, क्योंकि इसे मैच से पहले चार्ज किया जाता है और इसमें लगी चिप VAR के फैसलों में काफी मदद कर रही है. यह ठीक उसी तरह काम करती है जैसे क्रिकेट में स्निकोमीटर यह पता लगाता है कि गेंद बल्ले या पैड से लगी है या नहीं. उसी तरह, फुटबॉल में गेंद के किसी खिलाड़ी के पैर से टच होते ही सेंसर डेटा रिकॉर्ड करता है और VAR की मदद से ऑफसाइड जैसे फैसलों को अधिक सटीक बनाया जाता है.

कितने घंटे तक गेंद होती है चार्ज?

फीफा वर्ल्ड कप में इस्तेमाल होने वाली बॉल को हर मैच से पहले ढाई घंटे तक चार्ज किया जाता है. जब यह गेंद मैच में इस्तेमाल नहीं हो रही होती, तब इसे वायरलेस डॉक पर चार्ज किया जाता है. इसके लिए एक विशेष व्यक्ति भी नियुक्त किया गया है, जो गेंद की चार्जिंग का ध्यान रखता है. इस तकनीक से लैस गेंद को "कनेक्टेड बॉल" नाम दिया गया है. हालांकि, अभ्यास सत्र के दौरान खिलाड़ियों को चिप वाली गेंद नहीं दी जाती. इसलिए उन्हें केवल मैच के दौरान ही इस कनेक्टेड बॉल से खेलने का मौका मिलता है.

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कैसे लगाई गई चिप?

कनेक्टेड बॉल को लेकर जानकारी मिली है कि फुटबॉल में चिप लगाना सबसे बड़ी चुनौती थी, क्योंकि गेंद की एरोडायनामिक्स और बैलेंस से कोई समझौता नहीं किया जा सकता था. इस बॉल के चार पैनल हैं और उनकी साइड्स में चिप लगाई गई है, ताकि गेंद का संतुलन न बिगड़े. इसके लिए करीब 300 लैब टेस्ट किए गए और चिप वाली गेंद को बिना चिप वाली गेंद के व्यवहार के समान बनाया गया. नतीजतन, दोनों गेंदों में कोई अंतर महसूस नहीं किया जा सकता.

चिप के जरिए कैसे बना वर्ल्ड कप में इतिहास?

इस चिप वाली गेंद की मदद से अब तक एक बड़ा फैसला लिया जा चुका है. स्वीडन के खिलाड़ी मैटियास स्वानबर्ग ने मैदान में आते ही 22वें सेकंड में गोल दाग दिया. हालांकि, मैदानी रेफरी ने इसे ऑफसाइड करार दिया. लेकिन गेंद में लगी चिप और VAR की मदद से जब डेटा की समीक्षा की गई, तो पता चला कि स्वीडन के ही एक अन्य खिलाड़ी इसाक के पैर को गेंद हल्का सा छूकर मैटियास तक पहुंची थी और उस समय इसाक ऑनसाइड थे. जैसे ही गेंद इसाक के पैर से टच हुई, सेंसर ने उसे रिकॉर्ड कर लिया, ठीक वैसे ही जैसे क्रिकेट में स्निकोमीटर हलचल दिखाता है. इसके बाद रेफरी का फैसला बदला गया और गोल को मान्यता दे दी गई.

इस गोल के साथ मैटियास स्वानबर्ग फीफा वर्ल्ड कप में बतौर सब्स्टीट्यूट सबसे तेज, यानी 22 सेकंड में गोल करने वाले खिलाड़ी बन गए. उनका यह रिकॉर्ड गेंद में लगी चिप की मदद से ही संभव हो सका, क्योंकि नग्न आंखों से यह पता लगाना लगभग असंभव था कि गेंद मैटियास तक पहुंचने से पहले इसाक के पैर को छूकर गई थी.
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